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क्या मुर्दे भी कभी सोचते हैं

Posted On: 22 Jul, 2012 Others में

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ना मैं कुछ देख सकता हूँ
ना बोल सकता हूँ
और ना ही मैं कुछ
सुन सकता हूँ

मैं नहीं जानना चाहता
क्या हो रहा है मेरे आसपास
कौन जिन्दा है
और कौन मर रहा

मैं तो मशगूल हूँ बस
अपनी ही दुनिया में
और घुल रहा हूँ अपनी
रोटी-रोजी की चिंता में


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मुझमें नहीं है क्षमता

सोचने, समझने
और कुछ भी
बूझने की



सोचने समझने का काम
तो इंसान करते हैं
और मुझे लगता है कि
मैं इंसान ही नहीं रहा

मैं तो बन गया हूँ बस
एक चलता-फिरता मुर्दा
और तुम ही कहो
मुर्दे भी क्या कभी सोचते हैं

डॉ. अदिति कैलाश


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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

maheshchandrarahi के द्वारा
January 9, 2017

thank you. veri good kavita hai. maheshchandrarahi.blogspot.in

jlsingh के द्वारा
July 25, 2012

अदिति जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर व्यंग्यात्मक अभिब्यक्ति! और मैं क्या कहूं! बधाई!

shashibhushan1959 के द्वारा
July 24, 2012

आदरणीय अदिति जी, सादर ! “”मैं तो मशगूल हूँ बस अपनी ही दुनिया में और घुल रहा हूँ अपनी रोटी-रोजी की चिंता में”" सचमुच आज की आपाधापी भरी जिंदगी की यही सच्चाई है ! मजबूरी भी है ! और आम आदमी तो वाकई मुर्दा है, जो पांच साल में एक बार जागता है, वोट देने के लिए ! सादर !

D33P के द्वारा
July 24, 2012

अदिति जी नमस्कार ..आपकी ये पंक्तिया पड़कर अभी हाल गोवाहाटी में हुए हादसे की याद हो आई जहा घटना के समय लोग तमाशबीन की तरह तमाशा देख रहे थे कोई लड़की को बचाने के लिए आगे नहीं आया ,पत्रकार भी विडियो बनाने में व्यस्त रहे .,गोवाहाटी ही क्यों ये हादसे रोज़ अख़बार की शोभा बढ़ाते हुए ,इंसानियत को शर्मसार करते हुए दिखेंगे तब लगता है क्या वास्तव में इंसान मुर्दा हो गया है ,जिनके अन्दर कोई भावनाए हलचल नहीं करती …… ना मैं कुछ देख सकता हूँ ना बोल सकता हूँ और ना ही मैं कुछ सुन सकता हूँ मैं नहीं जानना चाहता क्या हो रहा है मेरे आसपास कौन जिन्दा है और कौन मर रहा मुझमें नहीं है क्षमता सोचने, समझने और कुछ भी बूझने की सोचने समझने का काम तो इंसान करते हैं और मुझे लगता है कि मैं इंसान ही नहीं रहा मैं तो बन गया हूँ बस एक चलता-फिरता मुर्दा और तुम ही कहो मुर्दे भी क्या कभी सोचते हैं उक्त पंक्तिया लिखते समय आपके दिल में क्या ख्याल था पता नहीं पर सच में आपने जो लिखा आज के हालत पर व्यंग करते हुए प्रतीत होते है …आभार

rekhafbd के द्वारा
July 24, 2012

अदिति जी ना मैं कुछ देख सकता हूँ ना बोल सकता हूँ और ना ही मैं कुछ सुन सकता हूँबहुत बढ़िया ,बधाई

chaatak के द्वारा
July 24, 2012

अदिति जी, आपकी लिखी इन पंक्तियों को पढने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुर्दे कभी नहीं सोचते! और इन मुर्दों की संख्या दिन ब दिन बढती जा रही है|

akraktale के द्वारा
July 24, 2012

अदिति जी सादर, सवा सौ करोड़ के देश में आम आदमी की स्थिति को बयान करती सुन्दर रचना. बधाई.

allrounder के द्वारा
July 24, 2012

अदिति जी, ऐसा प्रतीत होता है वर्तमान मैं मानव एक मशीन बन कर रह गया है, संवेदनाएं कम होती जा रही हैं, जिसकी वजह से उसके मुर्दा होने का आभास होता है, किन्तु अदिति जी मेरे विचार से मनुष्य मैं अभी प्राण बाकि हैं, सिर्फ वर्तमान माहौल मैं वह अचेत सा हो गया है, और आशा करनी चाहिए की जल्द से जल्द वह इस अचेतना से चैतन्य हो जाए ! मेरे विचार से मनुष्य को मुर्दा मानना थोड़ी सी कठोरता होगी ! अच्छे चिंतन के लिए बधाई आपको अदिति जी !

yogi sarswat के द्वारा
July 24, 2012

सोचने समझने का काम तो इंसान करते हैं और मुझे लगता है कि मैं इंसान ही नहीं रहा सही कहा आपने ! इंसान अब हैं कहाँ ? चलती फिरती भीड़ दिखती है बस !

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 26, 2012

    योगी जी, पंक्तियाँ सराहने के लिए आपका आभार…. इंसान सचमुच में कही खो गया है, और हम सभी एक भीड़ का हिस्सा बन गए है, पर भीड़ में कितनी शक्ति होती है ये भी भूल गए है, नहीं तो गोवाहाटी वाली घटना नहीं होती….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 24, 2012

लगता तो ऐसा ही है राष्ट्रीय चेतना सुप्त है. सुन्दर भाव युक्त कविता, बधाई.

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 26, 2012

    प्रदीप जी, आपका बहुत-बहुत आभार…… लोगों की इंसानियत सो चुकी है, इसे जगाना जरुरी है…..इसके लिए हम सभी को मिलकर ही कुछ करना होगा…..

R K KHURANA के द्वारा
July 24, 2012

प्रिय अदिति जी देख कर ख़ुशी हुई की तुम्हारे नाम के साथ डाक्टर शब्द जुड़ गया है ! बधाई ! मैं तो बन गया हूँ बस एक चलता-फिरता मुर्दा और तुम ही कहो मुर्दे भी क्या कभी सोचते हैं आज की मंहगाई के कारण आदमी मुर्दे के सामान ही हो गया है ! सुंदर सांकेतिक रचना ! राम कृष्ण खुराना

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 26, 2012

    चाचाजी, आपके आशीर्वाद के लिए आपका आभार…….काफी दिनों बाद आपका आशीर्वाद मिला, शायद आप कही व्यस्त हैं…… सही कहा आपने आजकल आदमी मुर्दे के समान ही हो गया है, कारण बहुत से हैं, रचना सराहने के लिए धन्यवाद……..

ajay के द्वारा
July 23, 2012

डॉ साहिबा, आपने तो हमारी ही व्यथा लिख डाली. हम सभी एक चलते-फिरते मुर्दे ही बन गए हैं, कई बार कुछ करना भी चाहते हैं पर कर नहीं पाते.

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 23, 2012

    अजय जी, रचना सराहने के लिये आपका शुक्रिया…..बिल्कुल सही कहा आपने……..

Mohinder Kumar के द्वारा
July 23, 2012

अदिति जी, मुर्दे सोचते तो जरूर हैं मगर करते कुछ नहीं…सांकेतिक संदेश देती कविता के लिये बधाई.

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 23, 2012

    मोहिन्दर जी, आपकी प्रतिकिया का तहेदिल से शुक्रिया…….

dineshaastik के द्वारा
July 23, 2012

आदरणीय अदिति जी, आम आदमी की पीड़ा को स्वर देती हुई काव्यात्मक प्रस्तुति के लिये बधाई….

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 23, 2012

    आपकी प्रतिकिया का तहेदिल से शुक्रिया दिनेश जी……

ajaykr के द्वारा
July 22, 2012

डॉ अदिति ,सादर प्रणाम | AAPKI बात तो सही हैं पर पूरी तरह मैं सहमत नही हूँ अगर सोचने वाले लोग ना होते तो जे जे पर आप जैसे विद्वानों का सानिध्य ही नही मिलता मैम | एक शायर साहिल साहब कहतें हैं – *************************************** “जीने की आरजू में , मरने लगा है आदमी अपने ही साए से , डरने लगा है आदमी बारूद के ढेर पे बिछा के बिसात ; चाहत उम्रे -दराज़ की ,करने लगा है आदमी . पसमांदा दिमाग , थका हारा बदन आट्मी ताकात का दम , भरने लगा है आदमी सीने में हसद , दिल में जलन अपनी ही आग में , जलने लगा है आदमी तर्जुमानी न कर सका , वेद -ओ -हदीस की मज़हबी जूनून में , मचलने लगा है आदमी न खौफे -खुदा ,न याद -ए-खुदा “साहिल ” शैतान की खिदमत सिर्फ , करने लगा है आदमी” *************************************************** हर आदमी को इस जिंदगी की इस दौड़ में टॉप रैंकर भी तो बनना हैं ,पर असंवेदना भी नही ठीक |अच्छी रचनाओ को लिखने के लिए हृदय से आभार | मेरा जीवन – एक कागज की नाव ; इसका इरादा तो केवल नृत्य ही करना है ‘ समय की लहरों पर , भरपूर नर्तन , निर्भय हो कर न इसे कोई किनारा चाहिए , न मंजिल This paper-boat-life of mine , intend to dance only ; on d waves of time , fearless n in full ; wish neither bank , nor destiny

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 23, 2012

    अजय कुमार जी, आपकी प्रतिकिया का तहेदिल से शुक्रिया…..बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ लिखी है आपने…….. आप ही कह रहे है कि मेरी बात तो सही हैं पर आप पूरी तरह मैं सहमत नही, खैर जरुरी नहीं है कि सभी आपकी बातों से सहमत हो…..वैसे सोचने वाले लोग तो हैं, पर उनके पास सोचने का समय नहीं है या शायद दूसरों के बारे में सोचना ही नहीं चाहते……..

    ajaykr के द्वारा
    July 25, 2012

    आपको मेरे ब्लॉग पर आमंत्रण हैं |

pritish1 के द्वारा
July 22, 2012

अच्छी रचना…… आज सच में इंसान सोचने समझने लायक नहीं रहा……

    Dr. Aditi Kailash के द्वारा
    July 23, 2012

    धन्यवाद प्रीतिश जी……..


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