मुझे भी कुछ कहना है

विचारों की अभिव्यक्ति

46 Posts

1665 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1876 postid : 985

राजनीति के रंग निराले भैया (कविता/व्यंग्य)

  • SocialTwist Tell-a-Friend

राजनीति के रंग निराले भैया
चलते हैं तीर और भाले भैया

बिन पेंदी के लोटा हैं सब
रोज ही बदले पाले भैया

फितरत की क्या बात करें हम
दिल के हैं सब काले भैया

सुबह शाम उड़ायें छप्पन भोग ये
जनता के लिए महँगी है दालें भैया

चुनाव भर घुमे ये घर-घर पैदल
कार में भी मंत्रीजी को आये छाले भैया

करते हैं सपरिवार विदेश में शॉपिंग
आमजन को है खाने के लाले भैया

संसद को बना दे ये आरोपों का अखाड़ा
विकास की बात पे जुबां पे लगे ताले भैया

रहती है इन्हें बस कुर्सी की ही चिंता
कुर्सी के लिए देश को भी बेच डाले भैया

बोफोर्स, चारा, टेलीकॉम, हवाला
इनके हैं बड़े-बड़े घोटाले भैया

राजनीति के रंग निराले भैया
दिल के हैं सब काले भैया

| NEXT



Tags:                   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

47 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nona के द्वारा
May 25, 2011

AKAIK you’ve got the anewsr in one!

rajkamal के द्वारा
July 14, 2010

यह नेता बेचारे भी क्या करे … पेंदे तो इनके भी होते है .. यह अलग बात है की .. वोह गोलाकार होते है चोकोर नहीं .. सिक्के का दूसरा पहलु भी है की .. इमान्दार नेता लोगो का हश्र और अंजाम हमने देख ही लिया की राजीव जी के साथ क्या हुआ था …

    aditi kailash के द्वारा
    July 15, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए आभार….

rajkamal के द्वारा
July 14, 2010

अदिति जी गुस्ताखी माफ .. मैं भी चातक जी की बात से सहमत हू …

    aditi kailash के द्वारा
    July 15, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, कृपया कर इस पोस्ट की कमी के बारे में जरुर अवगत कराएँ…

Arvind Pareek के द्वारा
July 13, 2010

सुश्री अदिति जी, सदैव की तरह बेहतरीन ब्‍लॉग पोस्‍ट जो मैंनें अभी-अभी पढ़ी हैं :- ■राजनीति के रंग निराले भैया (कविता/व्यंग्य) ■क्या फल और सब्जियां भी इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं (व्यंग्य/लेख) ■मैं और मेरा चाँद (कविता) ■मेरा पहला-पहला प्यार (लेख) नियमित लेखन और त्‍वरित प्रत्‍युत्तर देनें वाली अदिति जी अब तो बस प्रथम पुरस्‍कार शेष है । लगता हैं आपकी किस्‍मत में दो लैपटॉप लिखे हैं एक जो आपके पास है और दूसरा जागरण के प्रथम पुरस्‍कार का । मेरी बधाई अग्रिम रूप में स्‍वीकार करें । अरविन्‍द पारीक

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    अरविन्द जी, आपके स्नेह और प्रोत्साहन के लिए हम आभारी हैं, हमें पता है कि आप काफी कम समय के लिए ऑनलाइन हो पाते हैं, उतने कम समय में भी आप हमारी रचनाओं के लिए समय निकाल लेते हैं, जानकर अच्छा लगता है… आपकी शुभकामनायों के लिए आभार, रिज़ल्ट चाहे जो भी हो, पर आप लोग अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा, आप लोगों का प्रोत्साहन ही हमारे लिए सबसे बड़ा इनाम हैं…

sapan yagyawalkya के द्वारा
July 13, 2010

आपकी कविता राजनीति के बारे में आमजन के सोच को शब्द देती है.

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    सपन जी, आपके स्नेह और प्रोत्साहन के लिए आभार…

    Missy के द्वारा
    May 25, 2011

    THX that’s a great aswner!

sumityadav के द्वारा
July 13, 2010

बढ़िया व्यंग्य अदितीजी।  दिल के हैं सब काले भैया, आपने मारे इन पर भाले भैया,

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    स्नेह और प्रोत्साहन के लिए आपका आभार….

Nikhil के द्वारा
July 13, 2010

अदिति जी, राजनीति की जगह नेताओं का बैंड बजाय होता तो और भी मज़ा आता. राजनीति, थोड़ी उम्दा चीज़ है. इसके बिना कहाँ काम चलता है. व्यंग्य अच्छा बना है.

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार… सही कहा राजनीति एक उम्दा चीज़ है, पर ये नेता ही तो इसे गन्दा कर रहे हैं…. राजनीति और नेताओं को अलग नहीं किया जा सकता…. हमारे ख्याल से दोनों का ही एक साथ बैंड बज गया है….

allrounder के द्वारा
July 13, 2010

मैं तुमसे कहूँगा इस बात को अगर तुम, सीधे – सीधे कहतीं, इतना घुमा फिरा के न कहती, तो अच्छा होता !

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    कभी कहते हो घुमा-फिरा के कहती कभी कहते हो सीधे-सीधे कहती पहले आप डिसाइड कर लो गुड्डू कि आप कहना क्या चाहते हो…. अब जलेबी की तरह सीधापन हमें नहीं आता…. खैर ये तो था मजाक… आपको अगर पोस्ट में कोई कमी लग रही हो तो जरुर अवगत कराएँ…. आपका आभार…

    Buckie के द्वारा
    May 25, 2011

    Glad I’ve finllay found something I agree with!

Chaatak के द्वारा
July 13, 2010

व्यंग बाण चलाने में भी अच्छे हाथ दिखाए आपने | कहीं-कहीं पर एक हलकी सी कमी अखर रही है| बुरा मत मानियेगा मुझे ऐसा लगा | मीटर थोडा और बेहतर होता तो तीरों की धार और पैनी होती| इसे आपका पदार्पण मान लेते हैं | अच्छी पोस्ट, बधाई !

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    चातक जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत अच्छा लगा….. बुरा मानने की कोई बात ही नहीं है, वरन हमें अच्छा लगा की आपने हमारी किसी कमजोरी की तरफ ध्यान दिया… हमारा तो ये मानना है हर एक रचना में सुधार की गुंजाइश होती है…. सुधार से ही धार तेज होती है…. कमी से जरुर अवगत करियेगा…. हम सुधारने की कोशिश करेंगे… आपका आभार….

    Bubbie के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow, your post makes mine look feelbe. More power to you!

Deepak Jain के द्वारा
July 13, 2010

अदिति जी बोफोर्स और चारा तो दूर की बात नेताओं ने तो कारगिल युद्ध में ताबूतों को भी नहीं बख्सा और गलती तो हमारी ही है जो हम इन्हें नेता बनाते हैं दीपक जैन

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    दीपक जी, आपके स्नेह और प्रोत्साहन के लिए आभार… सही कहा आपने नेताओं की घोटालों की बात करें तो ये कभी भी ना ख़त्म हों…. आम जनता को ही जागरूक होना पड़ेगा और ये वक़्त की जरुरत है कि सभी अपने मताधिकार का सही उपयोग करें और योग्यता के आधार पर ही अपना नेता चुने….

anamika के द्वारा
July 13, 2010

बड़ा जोरदार व्यंग्य लिखा है आपने …………………बहुत अच्छा लगा…………..

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    आपका आभार….

Ramesh bajpai के द्वारा
July 13, 2010

बिन पेंदी के लोटा हैं सब रोज ही बदले पाले भैया फितरत की क्या बात करें हम दिल के हैं सब काले भैया        ………..अदिति जी सुंदर रचना अच्छी बात बधाई   

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    रमेश जी, आपको रचना पसंद आई… आपका आभार…..

    Cheyanne के द्वारा
    May 25, 2011

    Hhaahaha. I’m not too bright today. Great post!

    Taran के द्वारा
    May 25, 2011

    And I thought I was the sensible one. Thanks for setting me srtiahgt.


topic of the week



latest from jagran