मुझे भी कुछ कहना है

विचारों की अभिव्यक्ति

46 Posts

1665 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1876 postid : 794

पापा! मेरे लिए महान तुम्हीं हो (कविता)

Posted On: 20 Jun, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

fatherhood

थाम के मेरी नन्ही उंगली
पहला सफ़र आसान बनाया
हर एक मुश्किल कदम में पापा
तुमको अपने संग ही पाया

कितना प्यारा बचपन था
जब गोदी में खेला करती
पाकर तुम्हारे स्नेह का साया
बड़े-बड़े मैं सपने बुनती

लेकर व्यक्तित्व से तुम्हारे प्रेरणा
देखो आज कुछ बन पाई
तुम्हारे हौसले और विश्वास के दम पर
एक राह सच्ची मैं चुन पाई

बदला मौसम, छूटा बचपन
और मैं बच्ची नहीं रही
बन गई हूँ अब एक नारी
हूँ अब भी तुम्हारी छुटकी वहीं

सच कहती हूँ पापा मानो
मेरे तो भगवान तुम्हीं हो
सृष्टि के त्रिदेव से बढकर
मेरे लिए महान तुम्हीं हो


| NEXT



Tags:                   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (25 votes, average: 4.76 out of 5)
Loading ... Loading ...

47 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lyddy के द्वारा
May 25, 2011

Your asnewr was just what I needed. It’s made my day!

Brendy के द्वारा
May 25, 2011

Got it! Tanhks a lot again for helping me out!

bkhandelwal के द्वारा
July 5, 2010

पापा की याद कविता बहुत अछी लगी पापा को माँ की trahey भुलायानाही जासकता माँ और बाप हमरे sachhe गुरु hain

    aditi kailash के द्वारा
    July 5, 2010

    खंडेलवाल जी, सही कहा आपने पापा का त्याग और प्यार, माँ की तरह ही महत्वपूर्ण होता है और दोनों ही अतुलनीय हैं….. आपका आभार…

allrounder के द्वारा
June 21, 2010

मन के सच्चे और अच्छे उदगार मोती सी माला मैं पिरोने के लिए बधाई !

    aditi kailash के द्वारा
    June 22, 2010

    सचिन जी, आपका आभार…….

    Chasmine के द्वारा
    May 25, 2011

    Tohucdown! That’s a really cool way of putting it!

ashutosh kumar के द्वारा
June 21, 2010

ापा को समर्पित बहुटी ही सुन्दर रचना बहुत – बहुत धन्यवाद

    aditi kailash के द्वारा
    June 21, 2010

    आशुतोष जी, आपको कविता पसंद आई, आपका आभार…….

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
June 20, 2010

तात मातु स्नेहिल छप्पर, बाकी जगत पिपासा है | आदरित सदा रखते इनको धरती के भाग्यविधाता हैं || उस इश्वर को किसने देखा जिसने जगत बनाया है | मातु – पिता के रूप सखे हमने भगवान को पाया हैं || ये पक्तियां मेरी तरफ से आपकी कृति के भावों से प्रेरित ……………. बहुत अच्छी कविता है आपकी ……………..

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    शैलेन्द्र जी, बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ लिखी आपने……सही कहा आपने ईश्वर को किसने देखा है…..हमारे लिए तो माँ-पिताजी ही ईश्वर हैं..उनकी सेवा पूजा से बढ़कर है……..

Chaatak के द्वारा
June 20, 2010

वाह अदिति जी, आपने तो जागरण मंच पर जागरण का अलख ही जगा दिया. काश के आपका ब्लॉग पढ़कर उन भटके बच्चों को राह मिले जो अपने साक्षात देवों को नज़रंदाज़ कर कंकर पत्थर बटोरते हैं और इनके दिल को ठेस पहुंचाते हैं |

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    चातक जी, असली भगवान तो हमारे घर में ही रहते हैं….इंसान उन्हें भूल कर ढोंग रचाता फिरता है……..हमें अपने माँ-पिताजी के प्यार और त्याग को कभी नहीं भुलाना चाहिए….और उम्र के इस मोड़ पर जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरुरत होती है, उन्हें जितना दे सकते हैं प्यार देना चाहिए………बस हमारी ये तो एक छोटी सी कोशिश है….

yogendrayadav के द्वारा
June 20, 2010

WAKAI BHAWUK KAR DIYA APNE.

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    योगेन्द्र जी, हमें माँ-पिताजी के प्यार को कभी नहीं भूलना चाहिए…और कोशिश करना चाहिए की उन्हें कुछ ख़ुशी दे सकें…….आपका आभार…..

    Rose के द्वारा
    May 25, 2011

    It’s spooky how clever some ppl are. Tnahks!

Nikhil के द्वारा
June 20, 2010

बहुत अछि कविता. मैं तो वैसे भी अपने पिता के ज्यादा करीब हूँ. अपने बाबूजी के लिए मुझे ये भेंट देने के लिए आपका धन्यवाद. आभार, निखिल झा

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    निखिल जी, आपको कविता पसंद आई, आपका आभार……ये हमारे पापा को हमारी तरफ से पितृ दिवस पर एक छोटी सी भेंट हैं…….इस दुनिया में इन्सान दो लोगों के ही सबसे ज्यादा करीब होता है और वो हैं माँ-बाप…..हमें उनके प्यार को कभी नहीं भूलना चाहिए….

    Queenie के द्वारा
    May 25, 2011

    You have shed a ray of susnhine into the forum. Thanks!

sumityadav के द्वारा
June 20, 2010

बहुत सुंदर कविता, अदितीजी इस कविता के द्वारा आपने अपने पिता को सच्ची आदरांजलि दी है। मां के महत्व के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है मगर पिता को नेपथ्य में छोड़ दिया जाता है। एक पिता अपने बच्चों की हर खुशी प्रदान करने के लिए जमीन-आसमान एक कर देता हैं। पिता तुम्हें प्रणाम।

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    सुमित जी, सही कहा आपने माँ की ममता के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, पर पिता के त्याग के बारे में अभी भी बहुत ही कम ही कहा गया है……….हमारे लिए तो दोनों ही भगवान से बढ़कर हैं…… पापा-आई हमसे काफी दूर हैं, पर जब भी कोई मुश्किल होती है लगता है दोनों ही हमारे पास हैं और हमें हौसला दे रहे हैं……

    Paulina के द्वारा
    May 25, 2011

    Didn’t know the forum rules allowed such brlliaint posts.

kmmishra के द्वारा
June 20, 2010

मां बाप धरती पर बच्चों के लिये भगवान से भी बढ़ कर होते हैं । मां बाप के बाद फि गुरू और ईश्वर का स्थान आता है । बहुत सुंदर कविता है पिता के लिये ।

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    मोहन जी, बस ये हमारे पापा को हमारी तरफ से पितृ दिवस पर एक छोटी सी भेंट हैं……आज हम जो भी हैं वो सब पापा-आई के प्यार और हौसले का नतीजा है…….हमारे लिए तो दोनों ही भगवान से बढ़कर हैं…….

rajkamal के द्वारा
June 20, 2010

अदिति जी कविता बहुत ही अच्छी है आपकी दूसरी और कविताओ की ही तरह इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए…. कौशल जी ने जो बात कही है तो वोह एहसास बचपन के बड़े होकर भी बने रहे वेसे ही हमेशा के लिए … मेरी यही दिल से दुआ है…. में अपने पापा की मौत के बाद भी उस सच्चाई का यकीन नहीं कर पाया था…. इसिलिय उनसे मिलने का मन बनाया था… जहा चाह.. वहां राह… तो एक काबिल शक्श से मुलाक़ात भी हुई.. लेकिन तब तक ज़मीनी हकीकत समझ में आ चुकी थी … और मन को इस दुनिया में फिर से लगाना पड़ा …

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    राजकमल जी, आपने अपने पिताजी का साथ खो दिया, जानकर दुःख हुआ……पर क्या कर सकते हैं, ये तो जीवन की रीत है……आप जो प्यार अपने पापा से पाना चाहते थे वो अब अपने बेटे/बेटी को दे….और अपने पापा की इच्छा पूरी करने की कोशिश करें, यहीं उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी…..

kaushalvijai के द्वारा
June 20, 2010

अदिति जी, आपने बहुत सही लिखा, अब भी कभी-कभी जब माँ-बाप की याद आती है , तो मेरा तकिया गीला हो जाता है,क्या करें नौकरी तो करनी ही है.

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    कौशल जी, आपका आभार…आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में मन तो चाहता है हमेशा आई-पापा के साथ रहें, पर क्या करें मजबूरी है…..और याद कर-करके ही तकिये गीले करते रहते हैं…..


topic of the week



latest from jagran