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क्या नारी होना अपराध है ? (कविता)

Posted On: 17 Jun, 2010 Others में

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girl 6

कम लगता है मुझको
वो आतंकवाद
जो बम के धमाकों से
ख़त्म कर देता है जिंदगी
एक ही बार में ।
नारी जीवन में तो पल पल
छाया रहता है आतंक
और घुटती है, मरती है
वो हर पल, हर रोज ।


पानठेलों की चुभती निगाहें
आँखों से टपकती वासना
भीड़ में टटोलते कुछ हाथ
जो अक्सर दिल को
छलनी कर देते हैं ।
और इससे भी जी नहीं भरता
तो करके शरीर का बलात्कार
छोड़ देते हैं जिन्दा
घुटकर मरने
उम्र भर के लिए ।


इन दरिंदों के लिए
बच्ची, युवती, प्रौढ़ में
कोई फर्क नहीं ।
उनके लिए तो हैं ये
सिर्फ और सिर्फ
वासना की गुड़िया ।


क्या कहते हो तुम
नारी स्वतंत्र हो गई ?
पर तुम्हीं बताओ
उन चुभती नजरों से
लालची आँखों से
मैले-कुचैले हाथों से
कब होगी आज़ाद ?

क्या नारी होना अपराध है ?
या सुन्दर नारी एक अपराधी ?

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89 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Snow के द्वारा
May 25, 2011

Never seen a betetr post! ICOCBW

Soni garg के द्वारा
July 13, 2010

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंधे मोये एक दिन ऐसा आएगा मैं रोंधुंगी तोये !! जिस वक़्त आपकी ये कविता पढ़ी थी उसके कुछ आस पास ही मैंने भी लिखी थी “नारी का आंचल”उस पर आपकी प्रतिक्रिया शायद आई थी लेकिन अपनी प्रतिक्रिया आज दे रही हूँ हाँ भई अब इतनी सुन्दर रचना पढ़ी है तो उस पर कुछ देना तो बनता ही है ! हार के जीतने वाले को बाज़ीगर कहते है और देर से आने वाले को सोनी गर्ग कहते है ! देर से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ !

    aditi kailash के द्वारा
    July 13, 2010

    सोनी जी, आप माफ़ी मांगकर हमें शर्मिंदा ना करें… आपने हमें पढ़ा और सराहा, यहीं हमारे लिए बहुत बड़ी बात है… वैसे आपके बातों को कहने का अपना ही अंदाज़ है और हम उसे पसंद भी करते हैं…

swapnilktiwari के द्वारा
July 2, 2010

hmm..prashna to sahi hai … kavita me painpan bhi bahut hai .. samaj me kahne ko to badlaaw bahut aaye hain aurat ko lekar ..par wo badlaaw kabhi kabhi paryapt nahi maloom padte

    aditi kailash के द्वारा
    July 5, 2010

    स्वप्निल जी, आपको कविता पसंद आई आभार…. समाज को बदलने के लिए पहले हमें खुद को और अपने आस-पास को सुधारना होगा…

Astrologer DHIRAJ KUMAR के द्वारा
June 24, 2010

कम लगता है मुझको वो आतंकवाद, जो बम के धमाकों से ख़त्म कर देता है जिंदगी एक ही बार में । नारी जीवन में तो पल पल छाया रहता है आतंक और घुटती है, मरती है वो हर पल, हर रोज ।  ये पंक्तिया काफी अच्छी लगी | ऐसा लगा, काफी गहनता है बिचारो में | .. किन्तु बाद के वाक्य जो सिर्फ नारी शरीर में सिमित हो गया, खटक गया | निगाहें सिर्फ चुभन भरी ही नहीं होती | ये तो नारी का सौभाग्य है की उसे निगाहें देखती है, ये तो नारी के सुन्दरता का सम्मान है, इसे सिर्फ कुछ चुभन वाले नजरो के कारण ब्यथा न बनाये, ये सुन्दर काव्य भी हो सकते है |

    aditi kailash के द्वारा
    July 5, 2010

    धीरज जी, इतनी अच्छी टिप्पणी के लिए आभार….. वैसे ये कविता हमने किसी प्रसंग से प्रेरित हो कर लिखी थी और हम नारी आतंक का यहीं रूप दिखाना चाहते थे जो हर एक नारी अपने जीवन में कभी न कभी जरुर सहती है और जिसके बारे में कोई भी चर्चा नहीं होती है….. आपकी प्रतिक्रिया से हमें कुछ और लिखने की प्रेरणा मिली है… इस पर भी जरुर लिखेगे कभी….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए पुनः आभार……

dinesh johal के द्वारा
June 21, 2010

kavita ji, good morning . i have read your poem , so nice to read , hear . it charms to beholders

    dinesh johal के द्वारा
    June 21, 2010

    kavita ji, good morning . i have read your poem , so nice to read , hear . it charms to beholders

    aditi kailash के द्वारा
    June 21, 2010

    दिनेश जी, आपको कविता पसंद आई, आपका आभार……..

    aditi kailash के द्वारा
    June 21, 2010

    हमारा नाम कविता नहीं अदिति है, ये दूसरी बार है जब किसी ने हमें कविता के नाम से संबोधित किया है……खैर नाम में क्या रखा है……..

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा के द्वारा
June 20, 2010

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    पुरषोत्तम जी, बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं आप……..हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं……

Deepak jain के द्वारा
June 19, 2010

बहुत अच्छी कविता इस कविता को पढ़कर मुझे भी दो लाइन याद आ रही है – “नारी जीवन तेरी यही कहानी आँचल में है दूध और आँखों में पानी” दीपक जैन

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    दीपक जी, आपको कविता पसंद आई, आपका आभार…..

manav के द्वारा
June 19, 2010

बहुत ही सुन्दर रचना. तारीफ करने शब्द नहीं मिल रहे. thank you. मानव

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    मानव जी, आपके प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद…….

vivek के द्वारा
June 19, 2010

बहुत poem अच्छा है धन्यवाद

    aditi kailash के द्वारा
    June 20, 2010

    आपको कविता अच्छी लगी, आपका आभार……..

chaatak के द्वारा
June 18, 2010

कविता पर इतनी सारी प्रतिक्रियाँ पढ़ने के बाद मजबूर होकर फिर लिखना पड़ा- ‘इतनी अच्छी कविता जिसमें एक शब्द भी गलत नहीं लिखा है, उस पर तर्क वितर्क क्यों हों रहे हैं? अगर राह चलती कोई गलत महिला भी हो तो किसी दरिंदे या शरीफ को क्या हक है उसे ऊँगली करने का | बलात्कार अगर किसी वेश्या का हो तो भी दरिंदगी ही है| किसी ने कविता की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया, बहस शुरू कर दी | हाथ काट दो उसका जो किसी स्त्री की ओर गलत इरादों से उठे ! अब वह स्त्री किसी खानदानी परिवार से हो या भिखारिन, कोई स्कूल जाती बच्ची हो या धंधा करने वाली कोई वेश्या | लचर क़ानून वाले इस छद्म लोकतंत्र ने मानो हिन्दुस्तानी खून को पानी कर दिया, स्त्री को देखने के बाद काम इतना हावी हो जाता है तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में | स्त्री के चरित्र पर आक्षेप करने का अधिकार उसे कहाँ जिस पुरुष का अपनी वासना पर नियंत्रण ना हो? स्त्री हमारे आपके बीच रहती है उसे भरोसा दो कि हमारे रहते तुम्हे डरने कि जरूरत नहीं| अगर कोई स्त्री के साथ बदतमीजी करता है तो क्यों ना उसका फैसला वहीँ कर दिया जाय, सोच तो अपनी गन्दी है और मढ दिया स्त्री के सर! कोई स्त्री दिखे उलूल-जुलूल हरकत करते तो दो तमाचे खींच के और भगा दो गालियाँ दे कर लेकिन ये नहीं होगा क्योंकि कर तो रही है तुम्हारे मन वाला काम ही, कोई स्त्री किसी स्त्री को रिझाने के लिए भी कम कपडे पहनती है? दो जवाब, फिर भी चरित्र स्त्री का ही कमजोर है, वाह !

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    चातक जी, बहुत ही अच्छे तरीके से आपने बात कही……. मैं ज्यादा तो कुछ नहीं लिखना चाहूंगी, बस चाहूंगी की लोग आपकी ये दो बातों का मतलब समझ सके…. १. अगर राह चलती कोई गलत महिला भी हो तो किसी दरिंदे या शरीफ को क्या हक है उसे ऊँगली करने का ? २. कोई स्त्री दिखे उलूल-जुलूल हरकत करते तो दो तमाचे खींच के और भगा दो गालियाँ दे कर

    Teiya के द्वारा
    May 24, 2011

    No more s***. All posts of this quailty from now on

rudra के द्वारा
June 18, 2010

यार अदिति जी , नारी और अबला? मेरी मेनेजर एक नारी है और परेशां कर के रख दिया है. हम २० पुरुष वर्ग के लोग नमस्तक हैं उनके सामने. :) \" jokes apart …. अच्छी रचना है. आपके ब्लोग्स मैं रोज पढता हूँ. मुझे ब्लोग्स लिखने और प्रतिक्रिया देने का समय केवल शनिवार और रविवार को ही मिल पता है.

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    आपका आभार…

    Dilly के द्वारा
    May 25, 2011

    Walking in the presence of ganits here. Cool thinking all around!

    Destiny के द्वारा
    May 25, 2011

    Now that’s sbtule! Great to hear from you.

allrounder के द्वारा
June 18, 2010

चलिए, मैं आप के इन आंकड़ों से सहमत हूँ, और आपके प्रयास की सराहना करता हूँ ! मगर नारी असहाय नहीं है ! शायाद आप दिन मैं नेट पर नहीं थीं इसलिए आपको नहीं मालूम होगा की मैंने भी आज इत्तेफाक से नारी शक्ति की प्रतीक लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस के दिन उन पर एक रचना लिखी है आप उसे पढ़ें और बताएं मैं नारी शक्ति को बढाने मैं कितना कामयाब हुआ ! क्योंकि थोड़ी देर बाद मैं नेट से गायब हो जायूँगा !

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    हम भी नारी को असहाय नहीं मानते…..क्या आपको हमें पढ़कर ऐसा लगता है की नारी अबला या असहाय है…..बल्कि नारी अब अबला से सबला बन रही है…..पर सभी विरोध नहीं कर पाते हैं……. आपने बहुत अच्छी जानकारी दी की आज नारी शक्ति की प्रतीक लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस है….हम जरुर पढेंगे और अपनी भावनाओं से अवगत कराएँगे….

    allrounder के द्वारा
    June 18, 2010

    अरे आपको पढ़कर मैं आपको अबला समझने की भूल कैसे कर सकता हूँ अदितिजी चूंकि मैं झाँसी का रहने वाला हूँ और आज झाँसी की रानी का निर्वान दिवस है ! मैं पहले भी आपको कई नाम दे चूका हूँ, आज फिर एक नाम देता हूँ आज से आप झाँसी की रानी ! हालाँकि इतने गंभीर विषय पर मजाक सही नहीं, पर मेरा स्वभाव ही ऐसा है ! आज आप बहुत गुस्से मैं हैं, और मैं नेट से जा रहा हूँ आज गुस्से मैं आपने कुछ गलतियाँ की हैं, जिसकी अपेक्षा मैं आपसे नहीं रखता ! यदि आप उस गलती के बारे मैं जानना चाहती हैं तो कल मुझसे पूछियेगा ! आज आप समझ नहीं पाएंगी शायद !

Aditya के द्वारा
June 18, 2010

Aditi ji, Bahut badiya kavita hai. Achchha & Bura dono kisi bhi samaj aur kisi bhi samuday mein ho sakta hai. Ekl hi haath ki panchon ungliyan barabar nahi hoti. Satyug me jab Bhagwan Ram the to Raavan Bhee tha. isliye kisi ki galti ke liye poore samaj ko dosh dena theek nahi hai. main apni baat kehta hoon. jab bhi sadak par kisi ladki ko kisi ke dwara chhedkhaani karte hue dekhta hoon to apni ”aukat” ke anusaar virodh jaroor karta hoon. Lekin itna sahas sab nahi kar paate. isliye is KALIYUG me 4,5 saal ki bachchi se lekar 65 saal ki lady ke saath badtamiji hoti hai. Ek Achche vishay ke liye thank you & congratulations.

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    आदित्य जी, आपने बिलकुल सही बात कही….ये कविता पुरुषों के खिलाफ कतई नहीं है….. न ही ये यह दर्शाने के लिए है की नारी असहाय है……बस कोशिश ये है कि नारी कि व्यथा को लोगों तक पहुँचाना……आपने बिलकुल सही कहा कि इतना साहस सब में नहीं होता, न तो सभी नारियों में कि उसका विरोध कर सकें और ना ही सभी पुरुषों में कि उसे रोक सकें…….कई बार तो लोग जानबूझ कर देख कर भी अनदेखा कर जाते हैं…. आपका आभार…….

    Jetsyn के द्वारा
    May 25, 2011

    Good point. I hadn’t tuhoght about it quite that way. :)

ilovepoetry के द्वारा
June 18, 2010

हम चाहे स्वीकार करें या ना करें, पर ये एक कटु सत्य है. मैं भी एक पुरुष हु और मुझे भी ये स्वीकार करते हुए थोड़ी परेशनी हो रही है, पर झूठ कह देने से सत्य झूठ नहीं हो जाता. एक सड़ी मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है. हममे से कितने लोग है जो देख कर भी ऐसी छेड़छाड़ का विरोध कर पाते है. नारी को भगवन ने बनाया ही ऐसा है की वो बहुत कुछ सहन कर जाती है, पर जब पानी सर से निकल जाता है तो काली का रूप लेने से भी नहीं घबराती है. पर हमारे समाज का ढांचा ही ऐसा है की सभी नारी काली नहीं बन सकती और जो बनती है उन्हें पहले लोगो की आलोचना का शिकार होना पड़ता है. अदिति जी आपने बहुत ही अच्छी रचना लिखी, आपको बधाई.

    allrounder के द्वारा
    June 18, 2010

    भाई ilovepoetry आप जो कोई हैं आपको मेरा नमस्कार आप बिलकुल सही कह रहें हैं एक ख़राब मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है, ऐसी कहावत है! आज हमें जरुरत उस गन्दी मछली को ढूंढ कर मारने की जरुरत है, जो हमारा समाज रुपी तालाब गन्दा कर रही है ! इसी प्रकार नारी उत्पीडन रोकने के लिए देश को एक मजबूत कानून बनाने की जरुरत है न की पूरी की पूरी नारी बिरादरी को असहाय समझने और उन्हें उनके हाल पर छोड़ने की ! आप ने खुद ही कहा एक मछली तालाब को गन्दा कर देती है और मैं भी बही कह रहा हूँ, समाज मैं ऐसी बिकृत मानसिकता वाले लोगों को उँगलियों पर गिना जा सकता है !

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    महोदय, आपका धन्यवाद्…आप एक पुरुष हो कर नारी मन को इतनी अच्छी तरह समझ सकें….आभार……

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    सचिन जी, ऐसे दरिंदों की संख्या गिनने के लिए अब उंगलियाँ कम पड़ने लगी हैं……

allrounder के द्वारा
June 18, 2010

अदिति जी, आपकी इस कविता पर मैं क्या विचार दूं मैं कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ, क्योंकि आपकी ये कविता मैं उस दिन पढ़ रहा हूँ जिस दिन भारत की नारी शक्ति झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस है ! आपकी कविता पढने के बाद मुझे ऐसा लगता है छेड़छाड़ तक तो आपकी बात समझ मैं आ रही है, मगर अभी भारत मैं बलात्कार जैसे जघन्य अपराध ने बिकृत रूप नहीं लिया है, इसका इलज़ाम पूरी की पूरी पुरुष जाति पर लगाना गलत होगा ! ये सब तो चंद मानसिक रूप से विकृत रुपी लोगों ने समाज को दूषित कर दिया है ! मगर मैं आपसे कहना चाहूँगा की अगर नारी इस छेडछाड का विरोध कर अपने छेडछाड करने वाले को पहला एक थप्पड़ लगाये तो बाकी उसमें १०० लात जूते अपने आप ही लग जायेंगे और उसे मारने वाला कोई पुरुष ही होगा !

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    सचिन जी, आप में से कई लोग इस रचना का गलत मतलब लगा रहे हैं…..ये पुरुषों के खिलाफ नहीं है, ये तो दरिंदों के खिलाफ हैं (शायद मैंने तो ऐसा ही लिखा है)…. रही बात बलात्कार की तो मै बताना चाहूंगी कि भारत में १९७१ से लेकर २००६ के बीच बलात्कार कि संख्या में 678 % कि बढोत्तरी हुई है….ये तो हैं सरकारी रिकार्ड, हजारों केस तो ऐसे है जिनकी कुछ सामाजिक कारणों से पुलिस में शिकायत ही दर्ज नहीं कराई जाती है…..मेरे हिसाब से तो ये छोटी संख्या नहीं है…….

R K Khurana के द्वारा
June 18, 2010

नारी होना अपराध नहीं है ! आज की नारी ने साबित दिया है यह ! आज तो पुरुष नारी से डरते हैं एक अच्छी प्रस्तुती ! खुराना

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    चाचाजी, आपका आभार…..पुरुषों को नारी से डरने की जरुरत नहीं है…….जरुरत है उनको समझने की…उनसे सम्मान पाने की और उनको सम्मान देने की…..

seema के द्वारा
June 18, 2010

अदिती जी कविता एक कटु सत्य को ब्यान करती है और आपने जो प्रश्न किया उसके जवाब में कोई नारी सामने आकर खुले मन से नहीं कह पाई की हां हर नारी की यही दास्तां है | किसी न किसी रूप में नारी पुरुष के जुल्म का शिकार सदैव होती आई है और यह सिलसिला कभी रुकेगा , इसमे भी संदेह है | मै निराशावादी नहीं यथार्थ के धरातल पर सोचती हूँ , यह हमारे समाज का कटु सत्य है की नारी इस आधुनिक युग में पढी लिखी होकर भी सुरक्षित नहीं है | सम्वेदनाओं को झकझोरती कविता …..सीमा

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    सीमा जी, आपने मेरे मन का दर्द बयान कर दिया……क्यों नहीं कोई नारी सामने आकर खुले मन से ये कह पाती है कि हां हर नारी की यही दास्तां है…….आप भी नारी है, आप इस दर्द को बखूबी समझती होगी…. अच्छा लगा कि एक और नारी में इतनी हिम्मत तो है कि वो इस पर अपने विचार रख पाई…आपको बहुत बहुत बधाई…..

NIKHIL PANDEY के द्वारा
June 18, 2010

अदिति जी नारी होना कतई अपराध नहीं है.बल्कि गर्व का विषय है . अपराध है कुछ पुरुषो की नारी को वस्तु समझने की प्रवृत्ति और दूसरी तरफ अपराध है नारी का स्व्व्यम अपनी शक्ति और संस्कृति को भूलकर भोगवादी मायाजाल में फसकर आधुनिकता के नाम पर नंगा हो जाना … दोनों ही अपराधी है …..मगर नारी होना अपराध कतई नहीं है … वैसे कविता अच्छी है …..

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार…….मुझे भी गर्व है कि मैं एक नारी हूँ…..आप जिस आधुनिकता कि बात कर रहे हैं वो अभी भी बड़े शहरों में ही सीमित है…जबकि ७०% से ज्यादा जनसँख्या अभी भी गांवों में ही रहती हैं…..और शहरों में जो भोगवादी मायाजाल में फंसकर आधुनिकता के नाम पर जो भी होता है उसमें दोनों ही जिम्मेदार होते है और उसका अफ़सोस ना उन्हें होता है और ना समाज को….मैं तो यहाँ बात कर रही हूँ हमारे अपने समाज की……..

    Colonel के द्वारा
    May 25, 2011

    Didn’t know the forum rules allwoed such brilliant posts.

Nikhil के द्वारा
June 17, 2010

हर बुरे कारन हम खुद हैं. कहीं न कहीं नारी भी जिम्मेदार hai

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    क्या एक ४-५ साल की बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो उसकी जिम्मेदार वो मासूम है…….या एक ६५ साल की प्रौढ़ महिला का दामन उसके पोते की उम्र का लड़का तार तार करता है तो उसकी जिम्मेदार वो प्रौढ़ महिला है….या आपकी बहन को ट्रेन या बस की भीड़ में कोई जानबूझ कर धक्का-मुक्की करता है तो उसकी जिम्मेदार आपकी बहन है……शायद आपको मेरी बात बुरी लगी हो, पर ये सच्चाई है……

    Nikhil के द्वारा
    June 18, 2010

    माफ़ कीजियेगा, अदितिजी लेकिन चश्मा पहन कर लोगों की हाँ में हाँ मिलाने की आदत नहीं है मुझे. आपकी कविता अछि है और सच भी. लेकिन ज़रूरत इस बात की नहीं है की क्या हुआ और क्या हो रहा है. झाँसी की रानी, किरण बेदी, सुब्द्र कुमारी चौहान और मेरी कथा की नायिका सुहासिनी के इस देश में अगर औरत ये कहेगी की उसे उसका सम्मान नहीं मिलता तो में इससे असहमति रखता हूँ. ऐसे विषयों पर लेखों को सहानुभूति मिलती है. आपका प्रयास जायज़ है. लेकिन में पूछता हूँ, की क्या कोई इन्सान ४-५ साल की बच्ची का बलात्कार करेगा, क्या कोई इंसान ६५ साल की प्रौढ़ा का दामन तर-tar करेगा; उत्तर है नहीं. कुछ विकृत मानसिकता और दिमागी रूप से बीमार लोगों का उदहारण लेकर आप पुरे समाज पर कीचड नहीं उछाल सकतीं. आप में इतनी ताकत क्यूँ नहीं की बस में किसी के छेड़-छड करने पर उसका विरोध करें. आप में इतनी ताकत क्यूँ नहीं की हर उस दमन का जो आपके साथ होता है उसे रोकें. जब आपकी कविता पर आपके साथ आवाजा मिलाने वाले इतने लोग हैं तो आपको क्या लगता है हम आपके विरोध में आपका साथ नहीं देंगे. जहाँ तक रही मेरे बहिन की बात तो वो मेरी बहिन है, उस परिवार में पली बढ़ी है जहाँ उसे उसकी शक्ति का एहसास कराया गया. मैं पूछता हूँ, भारतवर्ष मैं जहाँ नारी, पत्नी नहीं माँ है; इसके उलट विचारों का पर्दापण किसने करवाया? अपनी जिम्मेदारी से भागने से काम नहीं चलेगा. ताली एक हाथ से नहीं बजती. आगे आइये और अपनी बेबसी पर आंसू बहाने के बजाय ये साबित कीजिये की आप कलिंगा की स्त्रियों की उस फ़ौज की तरह हैं जिन्होंने कंधे से कन्धा मिला कर अत्याचार के खिलाफ बगावत की थी. आप भारतवर्ष की नारी हैं, साबित कीजिये इसे; दिखा दीजिये की आपको हम भारतवाशी शक्ति और उर्जा का पर्याय क्यूँ मानते हैं. सिर्फ आंसू बहाने से कुछ न होगा.

    rajkamal के द्वारा
    June 18, 2010

    मेने ४-५ महीने पहले लिखा था लेकिन कहने से डर लगता था की पता नहीं लोग क्या सोचेंगे.. “मुझे चिंता है घर में अपनी दो साल की बेटी की जो की रेप की रेंज में आ गई है… मुझे चिंता है घर में अपनी 80 साल की बुडी माँ की भी जो शायद अभी तक भी रेप की रंज से बाहर नहीं हुई है…

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    निखिल जी, सबसे पहले तो आप अपनी आँखों का चश्मा उतार लें और ये समझ ले की ये रचना पुरुषों के खिलाफ कतई नहीं है, ये उन दरिंदों के खिलाफ है जो नारी को भोग-विलास की वस्तु समझते हैं… अब मैं पहले अपनी बात करती हूँ….मेरे साथ भी एक बार ट्रेन में चढ़ते समय ऐसे ही एक दरिन्दे ने बदतमीजी करने की कोशिश की थी…..हमने भी उसे ऐसा जोर का झापड़ लगाया था कि जिंदगी में अब किसी लड़की को छेड़ने से पहले हजार बार सोचेगा….पर सभी हमारे जैसे नहीं होते हैं…..और सभी इतनी हिम्मत नहीं कर पाते हैं…..हमारे आगे-पीछे के लोग देख रहे थे पर किसी में इतनी ताकत नहीं थी उसका विरोध कर सके…. आप पूछ रहे थे ना कि क्या कोई इन्सान ४-५ साल की बच्ची का बलात्कार करेगा, क्या कोई इंसान ६५ साल की प्रौढ़ा का दामन तार तार करेगा; तो जरा इस डाटा पर गौर फरमाइए….भारत में १९७१ से लेकर २००६ के बीच बलात्कार कि संख्या में 678 % कि बढोत्तरी हुई है….ये तो हैं सरकारी रिकार्ड, हजारों केस तो ऐसे है जिनकी कुछ सामाजिक कारणों से पुलिस में शिकायत ही दर्ज नहीं कराई जाती है….इनमें से बलात्कार के ७५% केस ऐसे हैं जिसमे अपराधी पीड़ित का जान-पहचान वाला होता है……और १०% तो रिश्तेदार ही होते हैं…….और लगभग २५% पीड़ित नाबालिक होते हैं….. भगवान ने नारी को इस तरह बनाया कि उसमें शायद कुछ ज्यादा ही सहन शक्ति दे दी है…..तब तक सहती है जब तक सह सकती है…..पर जब अति हो जाती है तो काली बनने से भी नहीं घबराती है……सही कहा आपने हमारे देश में झाँसी की रानी और किरण बेदी जैसी बहादुर नारियां पैदा हुई है….सही है, पर सभी तो नहीं बन सकती ना…और हमारे सामाजिक बंधन उन्हें बनने नहीं देता….और जो बनती है पहले उनके ऊपर भी उंगलियाँ ही उठाई जाती है….. इस रचना का उद्देश्य आँसूं बहाना या नारी को अबला साबित करना नहीं है, बस नारी कि व्यथा बताने कि कोशिश है…..

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    राजकमल जी, आजकल का समय ही ऐसा है कि किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता…..

ajaykumarjha1973 के द्वारा
June 17, 2010

बहुत अफ़सोस के साथ कहना पडता है कि ये सच है ………और ये उस समाज का सच है जिसे कभी अपनी सभ्यता , अपनी संस्कृति , अपने संस्कारों पर नाज़ हुआ करता था । जो ये जपता था कि ……यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते .रम्यन्ते तत्र देवता …….जाने आज ये श्लोक लिखने वाले होते तो क्या लिखते । आपने बहुत ही प्रभावी तरीके से अपनी बात रख दी

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    आपने बहुत सही बात कही….आपका आभार….

sumityadav के द्वारा
June 17, 2010

नारी की व्यथा को बयां करती एक मर्मस्पर्शी कविता। बहुत बढ़िया अदितीजी आपने सही कहां वासना भरी नजरों से आजादी कब मिलेगी नारियों को। दरअसल यहां पर बात सोच की है। सामाजिक सोच ही ऐसी बन गई है कि नारी को भोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है। नारी को सही सम्मान तभी मिल पाएगा जब ऐसी सोच समाज से मिटेगी। आशा करता हूं आपकी यह रचना ऐसे लोगों के मन में नारी के प्रति इज्जत की भावना को रोपित करे।

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार……..समाज जब तक ये नहीं समझेगा कि हर एक लड़की/नारी भी किसी कि बहन/ बेटी/ पत्नी/ माँ है तब तक समाज कि सोच बदलना मुश्किल है और नारी को सम्मान दिलाना भी…….

rajkamal के द्वारा
June 17, 2010

में साफ़ तोर पर कहता हु की मेरे समेत बहुतो में नेतिकता नहीं है बची…. अब जब दुसरो पर हँसता हु तो अपनी टांग क्यों न खिचू ….

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए आभार…..

Chaatak के द्वारा
June 17, 2010

अदिति जी, आपकी कविता बेहद संवेदनशील है | बस यही संवेदना है जो मुझे बार-बार आक्रोशित करती है, शायद मैं हिंसक हो उठता हूँ फिर चाहे वो बेहया आँखे पुरुष की हों या स्त्री की. आपके इस पोस्ट के पीछे छिपे दर्द पर चन्द पंक्तिया – ‘याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.’ (आपके विचारों के लिए) This is what I call real versification. Keep it up!!

    rajkamal के द्वारा
    June 17, 2010

    चातक जी – आप जब कोई गहरा शब्द कहते है तो कोष्टक में उसका अर्थ भी दिया करे…

    Chaatak के द्वारा
    June 17, 2010

    माफ़ कीजियेगा- (परिपाक=परिपक्व)

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    चातक जी, आपका आभार……ऐसी घटनाओं के कारण ही कई बार हमारा मन भी आक्रोशित हो जाता है….हमने नारी को कभी भी पुरुषों से कमतर नहीं समझा है, पर जब ऐसी घटनाएँ देखते हैं तो मन में टीस सी उठती है…. इतनी अच्छी पंक्तियों के लिए आभार….आपको हमारी लेखन शैली पसंद आई आभार….

    Lyddy के द्वारा
    May 25, 2011

    Posts like this brighten up my day. Thanks for tankig the time.

kmmishra के द्वारा
June 17, 2010

नारी का दर्द उकेरती मर्मस्पशी कविता । लेकिन नारी होना अपराध कतई नहीं है । नारी के बिना इस संसार की कल्पना करके देखिये ।

    kmmishra के द्वारा
    June 17, 2010

    मर्मस्पशी X मर्मस्पर्शी

    aditi kailash के द्वारा
    June 18, 2010

    मोहन जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…..मुझे तो नारी होने पर गर्व है……पर ये रोज-रोज का आतंक जब मन को छलनी कर देता है तो जेहन में इस तरह के सवाल खड़े हो जाते हैं…..


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