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"ये गरीबी भी कमबख्त ऐसी चीज़ होती है कि हमें बेटी की इज्ज़त भी दांव पर लगाना पड़ता है" (लेख)

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bijali5कुछ दिनों पहले की ही बात है….मैं अपनी मित्र मुक्ता के घर गई थी …… अभी मैं बैठी ही थी कि एक १३-१४ साल की लड़की ट्रे में ठन्डे पानी का गिलास ले कर आ गई…..यूँ तो मैं पहले भी मुक्ता के घर जा चुकी हूँ, पर आज पहली बार इस लड़की से मेरा सामना हुआ था……उसके जाने के बाद जब मैंने पूछा कि यह कौन है, तो पता चला कि ये बिजली है, उनकी नई काम वाली है…….. इतना सुनते ही मेरे चेहरे के हाव-भाव बदलने लगे, और मुक्ता भांप गई कि मैं क्या सोच रही हूँ…..मेरे पूछने से पहले ही वो बोल पड़ी….. “मुझे पता है तुम मन में क्या सोच रही हो……वो क्या है ना अदिति, आजकल हमारी तबियत ठीक नहीं रहती है और सास-ससुर दोनों के अभी-अभी गुजरने के बाद इतने बड़े घर को संभालने वाला कोई चाहिए था……. दिनभर तो दूसरी काम वाली रहती ही है , पर शाम के बाद बच्चों को देखने हमें कोई ना कोई चाहिए था, इसलिए एजेंसी कि मदद से ये लड़की हमें मिल गई…..वरना यहाँ तो २४ घंटे के लिए काम वाली मिलना बहुत ही मुश्किल है”…….

एजेंसी का नाम सुनते ही हमारे दोनों कान खड़े हो गए…….और अपने स्वभाव के मुताबिक करने लगे पूछताछ……. और मुक्ता ने जो बताया, उसे सुनकर तो ये मन बहुत विचलित हुआ…….

क्या है ये मायाजाल
bijali 4बड़े-बड़े शहरों में, जहाँ दम्पति कामकाजी होते हैं, उन्हें अक्सर बच्चों की देखभाल के लिए २४ घंटों के लिए काम वाली बाईयों की जरुरत होती है….. उनकी इन जरूरतों को पूरा करते है ये एजेंसी वाले…….इनका एक पूरा जाल ही बना हुआ होता है, जिसके द्वारा ये झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि गरीब राज्यों के गांवों से ११-१२ साल की लड़कियां लाकर शहरों में काम पर लगाते हैं…… इनका कांट्रेक्ट ११ महीनों का होता है…… जिसके लिए ये आपसे एक साल के १५०००-१८००० रूपये लेते हैं और लड़की से उसके २-३ महीने की कमाई….. आपको लड़की को महीने के २५०० रुपये देने होते हैं, खाना-रहना साथ में ……. अगले साल अगर आपको जरुरत है तो आपको फिर से नया कांट्रेक्ट करना पड़ता है….

किसको फायदा
इसमे सबसे ज्यादा फायदे में है एजेंसी वाला, जो दोनों हाथों से कमा रहा है…….उसे कांट्रेक्ट से और लड़की से, दोनों से ही कमाई हो रही है……लड़की के लिए भी ये फायदेमंद होता है……इसी बहाने वो व्यवहार कुशल हो जाती है…… नई-नई चीज़े सीखती है…..पढ़े-लिखे लोगों के बीच रहकर उसके रहन-सहन और व्यवहार में सुधार आता है……ज्यादातर देखा गया है कि इन लड़कियों की शादी बाद में उनके समाज के आर्थिक रूप से संपन्न लोगों से होती है…….

नुकसान किसका
bijli 6बिजली जैसी कई लड़कियां हैं जो अपने परिवार का पेट भरने के लिए अपना बचपन कुर्बान कर रहीं हैं…….खेलने-कूदने की इस उम्र में रोटी-रोज़ी के चक्कर में पड़ गई हैं…….परिवार की आर्थिक तंगी के कारण मजबूर हो कर बाल श्रम करने के लिए मजबूर हैं…..और अपने सपनों का गला घोंटकर अंधकारमय जीवन जीने के लिए भी…….. पर इस विशेष प्रकार के बाल श्रम का एक और अलग पहलु है……अगर लड़की को अच्छा घर मिल गया तो ठीक है, नहीं तो उसका तो भगवान ही मालिक है……उम्र में छोटे होने के कारण ऐसी लड़कियों का मानसिक शोषण आम बात है…….घर से हजारों किलोमीटर दूर, अनजानों के बीच, लड़ती रहती हैं ये अपने आप से…… उसका दुःख बांटने कोई भी पास नहीं होता है ……कई मामलों में शारीरिक शोषण से भी इनकार नहीं किया जा सकता है……फिर भी परिवार की खुशियों की खातिर सब कुछ सहती रहती है, ये लड़कियां चुपचाप…….

बिजली की कहानी
bijli1बिजली ने हमें अपनी जो कहानी बताई, वो कुछ इस तरह थी…….बिजली के घर में माँ-बाप के अलावा ४ छोटे भाई-बहन और हैं…..पिता मजदूरी करते हैं और माँ घर-घर झाड़ू-बर्तन……..पर दोनों मिलकर भी इतना नहीं कमा पाते कि ७ लोगों का ये परिवार रोज पेट भर खाना खा सके…….गरीबी ने कभी बिजली को स्कूल का मुँह देखने नहीं दिया और घर में सबसे बड़ी होने के कारण ८-९ साल की उम्र से ही माँ का हाथ बँटाने लगी….ज्यों ही बिजली ११-१२ साल हुई, एक दिन राजू नाम का एक व्यक्ति, जो की गाँव का ही है पर अब शहर में रहता है, आया…….और उसने गरीबी का हवाला और पैसों का ख्वाब दिखा कर माँ-बाप को तैयार कर लिया कि वो बिजली को उसके साथ शहर भेज दे….पहले तो माँ-बाप तैयार ना थे, पर अपनी गरीबी कि हालत देखकर और गाँव से गई अन्य लड़कियों की सुधरती हालत देखकर तैयार हो गए…….और आ गई बिजली अपने गाँव से दूर अनजान लोगों के बीच…….

पहले तो कुछ दिन उसे पास के शहर में ही काम दिया गया, और कुछ महीनों बाद वो घर से हजारों किलोमीटर दूर दिल्ली भेज दी गई…. उसकी किस्मत से दिल्ली में उसे पहला ही घर बहुत अच्छा मिला……मालकिन बहुत अच्छी थी और बड़े प्यार से रखती थी……३ साल तक उसी मालकिन के यहाँ काम किया और ३-४ महीने पहले ही उस मालकिन की भाभी यानि मुक्ता के घर आ गई…..

बिजली के ही शब्दों में……..ये दीदी भी बहुत अच्छी है….. हमारा ख्याल रखती हैं…..हमें अच्छी -अच्छी बात सिखाती हैं, कैसे रहना है, कैसे बात करना है…….इन्होने हमें पढना-लिखना भी सिखाया………और तो और हम अब कई तरह का खाना भी बना लेते हैं……..इनके दोनों बच्चे भी बहुत प्यारे है और हमें बहुत प्यार करते हैं……..अपने गांव जाते है तो लोग हमें बहुत इज्ज़त देते हैं …..पर………पर अपना घर तो अपना होता है ना, चाहे वो टूटा-फूटा क्यों ना हो…….. यहाँ टी वी, फ्रीज़, कूलर और ऐशों-आराम की सभी चीज़े हैं, पर घर में बिना पंखे के भी हमें ज्यादा अच्छी नींद आती थी…….मन में कभी डर नहीं रहता था…….

बिजली के पिता की जुबानी

bijliक्या बताएं मैडम जी, हम तो बिजली के कर्जदार है……भगवान ऐसी बेटी हर माँ-बाप को दे……आज इसके कारण ही हमारे दो बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं…….बिजली चाहती है कि वो भी पढ़-लिखकर भैयाजी और दीदी की तरह बड़े आदमी बने……उन्हें उसकी तरह काम ना करना पड़े……हम तो भैयाजी और दीदी के भी शुक्रगुजार हैं, जो बिजली को बड़े प्यार से घर के सदस्य की तरह रखते हैं…….बिजली यहाँ से बहुत अच्छी बातें सीख रही है…..जब ये वापस आएगी तो हमें इसकी शादी की चिंता नहीं रहेगी…… एक से एक अच्छे लड़के आयेंगे बिजली को ब्याहने……बिजली बताती है कि उसे यहाँ कोई तकलीफ नहीं है…….

इतना कहते ही आँखों में पानी आ जाता है और दिल का दर्द जुबान पर आ जाता है…….हमारा भी मन कहाँ कहता है कि बिजली काम करें, पर क्या करें गरीबी चीज़ ही ऐसी होती है, आदमी मजबूर हो जाता है……बिजली को दूर भेज कर हम भी कहाँ चैन से सोते है…….हर समय बस यहीं चिता लगी रहती है कि बिजली ठीक तो है ना…….ये गरीबी भी कमबख्त ऐसी चीज़ होती है कि हमें बेटी की इज्ज़त भी दांव पर लगाना पड़ता है…..

हमारी सोच
मुक्ता ने बताया कि उन्हें भी अच्छा नहीं लगता कि इतनी छोटी लड़की से काम करा रहे हैं……पर क्या करें हम नहीं रखेंगे तो कोई और रख लेगा……क्या पता फिर उसे कैसा घर मिले…….यहाँ ये सोचकर तो अच्छा लगता है कि कम से कम अच्छे लोगों के बीच है…. पिछली बार बिजली के पिताजी उससे मिलने आये थे तब हमने उनसे बात करके इस बात के लिए राजी कर लिया कि अब हमारा कांट्रेक्ट सीधा हो ताकि जो भी हम पैसा दे रहे हैं वो सीधा बिजली के घर वालों को मिले ना कि एजेंसी को…. पैसा तो हमें देना ही है, तो क्यों ना वो सही हाथों में जाये…….

दिल को चुभते प्रश्न
bijaliआज भी रह-रह कर मासूम बिजली का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है……अभी बचपन गया नहीं, पर उम्र के पहले ही वो इतनी समझदार हो गई कि परिवार की खुशियों कि खातिर अपनी ही खुशियों का गला घोंट दिया……..ये पूरी कहानी सुनकर दिलो-दिमाग में ढेर सारे प्रश्न घूमने लगे …….क्या माँ-बाप गरीबी के हाथों इतने मजबूर हो गए कि अपनी बेटी की इज्जत को भी दांव पर लगाने से नहीं डरते …. कुछ पैसों की खातिर अपनी बेटी को अपने से हजारों किलोमीटर दूर अनजान लोगों के बीच भेजने में भी नहीं डर रहे, जहाँ बेटी है बिलकुल अकेली और अनजान……..वो बेटी जिसने कभी बाहर की दुनिया में कदम भी नहीं रखा, अपने परिवार के भूखे पेट की खातिर रोज घुटते हुए जी रही है…….. क्या गरीबी सही में इतनी निर्दयी होती है जो इन्सान से कुछ भी कराती है……

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा के द्वारा
June 20, 2010

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

samta gupta kota के द्वारा
June 17, 2010

अदिति जी,ठीक इसी तरह दया के भाव तब भी आते हैं जब हम किसी बुजुर्ग को रिक्शा चलाते देखते हैं और ये भी बुरा लगता है की हम इनके रिक्शे पर आराम से बैठें और ये रिक्शा चलायें,लेकिन दो चीजें की जा सकती हैं या तो कोई उनकी सेवाएँ यह सोच कर नहीं ले की ये अन्याय है कि हमारा बोझा एक बुजुर्ग ढोयें तो वो खायेंगे कैसे ?और फिर इस तरह उन्हें भीख माँगने की तरफ धकेलें या कि हम उनकी सेवाएँ लेकर थोडा ज्यादा किराया दें, उनसे सम्मान से बात करें और यदि घर तक आये हैं तो चाय-पानी भी पिला दें कुछा खिला दें जिससे की उन्हें मेहनत कम करनी पड़े और खुद कमाकर खाने का स्वाभिमान भी उनमें बना रहे और उन्हें भीख मांगकर गुजारा नहीं करना पड़े, हालाँकि इस उम्र मैं भी आराम की बजाय कठिन शारीरिक श्रम उन्हें क्यों करना पद रहा है यह एक अलग विषय है,

    aditi kailash के द्वारा
    June 17, 2010

    समता जी, आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया पढ़कर मन खुश हो गया….पता नहीं क्यों आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर अक्सर लगता है हमारी सोच काफी मिलती है….. बाकी लोगों का पता नहीं, पर मै अक्सर ऐसा करती हूँ…. अक्सर मैं ऑटो-रिक्शा की जगह साइकल रिक्शा लेना पसंद करती हूँ, चाहे थोडा ज्यादा वक़्त क्यों ना लग जाये….और अक्सर बुजुर्ग रिक्शा चालक को जितने में बात हुई हो उससे ५-१० रुपये ज्यादा ही देती हूँ…..पता नहीं पर ऐसा करके मन को अच्छा लगता है…. भिखारियों को भी मैं कभी भीख नहीं देती…….क्योंकि मुझे लगता है हम इससे भिक्षा वृत्तिको बढावा ही दे रहे हैं…..साथ ही उस पैसे का सदुपयोग हो रहा है या दुरूपयोग ये भी हमें पता नहीं होता…..उन्हें १-२ रुपये देने के बजाय मैं उन्हें चाय पिला देती हूँ या कुछ खाने को दे देती हूँ…..कम से कम इससे ये तो पता होता है कि हमारे द्वारा दिए गए दान से किसी की भूख मिटी…. आपका पुनः आभार ……आपसे बात करके बहुत अच्छा लगता है…..

Deepak Jain के द्वारा
June 14, 2010

अदिति जी अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा शायद आपको मेरी बात पसंद न आये क्यूंकि मैं खुद छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले का रहने वाला हूँ जहाँ से अधिकतर आदिवासी लड़कियां कम उम्र में ही बड़े शहरों खासकर दिल्ली जाती हैं और उनको दिल्ली ले जाने के का कम कुछ एजेंट करते हैं मैंने ऐसी कुछ लड़कियों से इस बारे में बात भी की है परन्तु मुझे इसका कारण सिर्फ गरीबी ही नहीं लगता क्यूंकि आज जशपुर जिले में रोजगार की कोई कमी नहीं और बात रही उम्र की तो आज भी इस उम्र की लड़कियां वही कम यहाँ करके इससे भी ज्यादा पैसा कम सकती हैं परन्तु अधिकतर लड़कियां बड़े शहरों में घुमने के शौक के कारण वहाँ जाना पसंद करती हैं और वहाँ जाकर उनका शारीरिक शोषण भी किया जाता है और ये बात उन्हें अच्छी तरह से पता होती है परन्तु बड़े शहरों की चकचौंध और दिल्ली का नाम उन्हें अपनी और आकर्षित करता है खासकर जशपुर जिला आज भी विकाश की दृष्टि से काफी पीछे है और यहाँ के आदिवासी लोगों में अभी भी जागरूकता की कमी हैमई आपके इस लेख के लिए आपको धन्यवाद देना चाहूँगा की आपने ये बात लोगों के सामने रखी दीपक जैन

    aditi kailash के द्वारा
    June 14, 2010

    दीपक जी, छत्तीसगढ़ से मेरा बहुत पुराना और अटूट रिश्ता रहा है……और आप जिस नए जशपुर जिले की बात कर रहे हैं, मै भी उस पुराने रायगढ़ जिले में रह चुकी हूँ……..वहां ज्यादातर आदिवासी जनसँख्या है……शायद आप की बात कुछ हद तक सही हो पर अभी भी वहां रोजगार की इतनी उपलब्धता नहीं है कि लोग इतना कमा सके…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार…..

http://jarjspjava.jagranjunction.com के द्वारा
June 14, 2010

नमस्कार अदिति जी, एक बेहतरीन लेख के लिए आपको बहुत बधाई! आज कल ये गरीबी की वजह बेहिसाब पैदा की गयी संतान ही हैं.. अगर इंसान या यूँ कहे किसान और गरीब मजदूर वर्ग के लोग (vaise meri baat samaaj के har वर्ग vishesh के लिए हैं…) utne ही संतान पैदा करते जितनो की वो देखभाल करने में saksham हैं to shayad ये haalaat nhi bante… khair इंसान dharti pr aataa hai jeene के लिए.. अपने maa baap की देखभाल krne के लिए… samaaj ka hissa banne के लिए… एक jimmedaari uthaane के लिए…. , sukh dukh bhogne के लिए.. phir वो chaahe ladka ho या ladki usko aage badh kar ये sab kaam krne ही padte हैं और phir har kaam ko krne में jokhim hai.. chahe वो jaan ka ho या izzat ka… | खैर… लड़कियां .. हमारे समाज में एक विशेष स्थान रखती हैं.. उनके नजरिये se ये sachmuch बहुत ही गलत है और ख़तरनाk भी.. maine आपकी ताज़ा तरीन रचना भी पढ़ी है.. और कोई हैरानी नही हुई की आपको भी internet को atyadhik उपयोग करने की बिमारी हो गयी है.. :) comment jhelne के लिए आभार एवं धन्यवाद, निखिल Singh :)

    aditi kailash के द्वारा
    June 14, 2010

    निखिल सिंह जी, धन्यवाद्……बहुत सही लिखा आपने, समाज में फैले सभी अनियामितायों का मुख्य कारण गरीबी और गरीबी का मुख्य कारण बढती जनसँख्या है….जब तक इसका इलाज नहीं मिल जाता, लोग इस तरह जोखिम लेने मजबूर होते रहेंगे….

    aditi kailash के द्वारा
    June 14, 2010

    अच्छा रचनाकार वो होता है जो अपने पाठकों की प्रतिक्रियाओं का स्वागत करें, चाहे वो प्रशंसा हो या आलोचना…..तो फिर झेलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता……हमें तो हमेशा प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहता है…….

rajkamal के द्वारा
June 14, 2010

आपको कमेन्ट में छेड़छाड़+ कांट-छाट की पूरी इज़ाज़त है- chhotu वाली लाइनs में ही कुछ सुधार कर लीजियेगा-

    aditi kailash के द्वारा
    June 14, 2010

    आपने बिलकुल सही लिखा है……सुधार की कोई जरुरत नहीं हैं…….

Chaatak के द्वारा
June 13, 2010

अदिति जी, आप का पोस्ट पढ़ कर सहसा अदम जी गोंडवी की पंक्तियाँ याद हो आई- “वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है”

    aditi kailash के द्वारा
    June 13, 2010

    चातक जी, बहुत ही सटीक प्रतिक्रिया दी है आपने…..अदम जी गोंडवी की ये पंक्तियाँ बिलकुल उपयुक्त बैठती है….यूँ लगता है मानो इसी तरह की किसी बिजली के लिए लिखी गई हों……वैसे शहर की हर एक गली-मोहल्ले में आपको ऐसी अनगिनत बिजलियाँ मिल जाएँगी, जो अपने परिवार की खातिर अपने इज्ज़त को भी दांव पर लगाने से नहीं डरती…. प्रतिकिया के लिए आभार…..

yogendrayadav के द्वारा
June 12, 2010

अदिति जी अच्छा मुद्दा उठाया है अपने.

    aditi kailash के द्वारा
    June 13, 2010

    योगेन्द्र जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार………

sumityadav के द्वारा
June 12, 2010

अदितीजी,  बधाई। समाज के सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बालश्रम पर आपने बहुत उम्दा लेख लिखा है। होटलो में  काम करते बच्चे, कचरे बीनते बच्चे, ये सब गरीबी से लाचार हैं। गरीबी के कारण इनका बचपन  छिन जाता है, पता नहीं कितनी बिजली जैसी लड़की हैं पर सबको आपके और आपकी मित्र मुक्ता जैसे अच्छे लोगों का साथ नहीं मिलता। आशा करता हूं बालश्रम एक दिन जड़ से खत्म होगा।

    aditi kailash के द्वारा
    June 12, 2010

    सुमितजी, आपका आभार…..बल-श्रम को अगर जड़ से खत्म करना है तो हमें सबसे पहले गरीबी दूर करनी होगी…और गरीबी दूर करने के लिए सबसे पहले इस वर्ग को परिवार नियोजन के उद्देश्यों को समझना होगा…. इन्हें शिक्षित करना होगा……

geetanjali pandey के द्वारा
June 12, 2010

अच्छे विषय पर लेख के लिए आपको बधाई. सही कहा बिजली के पिता ने “ये गरीबी भी कमबख्त ऐसी चीज़ होती है कि हमें बेटी की इज्ज़त भी दांव पर लगाना पड़ता है”. माँ-बाप भी क्या करें, गरीबी के कारण अपने दिल पर पत्थर रखकर अपनी बेटियों को भेज देते है अनजान लोगों के बीच. उनकी भी मजबूरियां है. ये तब तक बंद नहीं होगा, जब तक इनकी गरीबी ना दूर की जाये.

    aditi kailash के द्वारा
    June 12, 2010

    उसके पिता के ये शब्द कि “ये गरीबी भी कमबख्त ऐसी चीज़ होती है कि हमें बेटी की इज्ज़त भी दांव पर लगाना पड़ता है” ही उनकी मजबूरी बयां कर देते हैं……सही कहा आपने इसके लिए ये जरुरी है कि उनकी गरीबी दूर की जाये…….. आपका आभार……….

geetanjali pandey के द्वारा
June 12, 2010

अदिति जी, आपने बल-श्रम के एक अनछुए रूप से रूबरू कराया. पर लोग भी क्या करें, कभी अपनी जरुरत के लिए तो कभी उनकी गरीबी पर तरस खाकर ये सब करने मजबूर हैं…..

    aditi kailash के द्वारा
    June 12, 2010

    गीतांजलि जी, हम जैसे लोग, बिजली जैसी हर लड़की को कभी अपनी जरूरतों के लिए तो कभी उन की गरीबी पर तरस खा कर काम पर रख ही लेते हैं……… पर सभी घर में ये बिजलियाँ सुरक्षित नहीं हैं………..

razia mirza के द्वारा
June 12, 2010

आपके इस लेख को पढकर बहोत सी यादें ताज़ा हो जाती हैं जो हमारे आसपास कि घटनाएं बनकर रह जाती हैं।

    aditi kailash के द्वारा
    June 12, 2010

    रज़िया जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार……बल श्रम का ये एक नया पहलु है जो आजकल तेजी से अपने पैर पसार रहा है……..

Nikhil के द्वारा
June 12, 2010

बहुत खूब. ये बिजली की नहीं भारत के हर तीसरे बच्चे की कहानी और मज़बूरी है. आभार निखिल झा

    aditi kailash के द्वारा
    June 12, 2010

    निखिल झा जी, सही कहा आपने…….हमारे आसपास कई बिजलियाँ है तो अपने परिवार के भूखे पेट की खातिर अनजान लोगों के साथ असुरक्षा के बीच रहने मजबूर है….. प्रतिक्रिया के लिए आभार….


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