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ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है (कविता)

Posted On: 8 Jun, 2010 मेट्रो लाइफ में

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viranना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

मुश्किल है अब तो जीना एक पल भी तेरे बिन
ये जान कर भी तू मुझसे यूँ अनजान क्यूँ है

कमी नहीं है प्यार की इस जहाँ में देख लो
पर हर शख्स यहाँ इतना परेशान क्यूँ है

दोस्ती से हसीं कुछ नहीं है इस जहाँ में यारों
हर दिल में यहाँ दुश्मनी का सामान क्यूँ है

नहीं सोचा था रह जाउंगी मै भी कभी यूँ तन्हा
सपनों के रास्तें में ये बड़ा शमशान क्यूँ है


ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nikhil के द्वारा
June 9, 2010

अच्छा लिखती है आप …अच्छी ग़ज़ल है

    aditi kailash के द्वारा
    June 9, 2010

    निखिल जी, बस एक छोटी सी कोशिश की है……. आपका आभार……..

rajkamal के द्वारा
June 8, 2010

बहुत अच्छी कविता- लिखना तो और भी चाहता था- लेकिन फिर कभी सही- लोग हम शायरों के बारे में शायद ठीक ही कहते है- की हम मूडी होते है-

    aditi kailash के द्वारा
    June 9, 2010

    राजकमल जी, आपका आभार……….प्रतिक्रिया नहीं मिली या यूँ कहूँ काफी समय तक नहीं मिली तो लगा शायद आपको रचना पसंद नहीं आई, क्योंकि आप जैसे कुछ पाठक हैं इस मंच पर जो नए रचनाकारों का हरदम उत्साह बढ़ाते हैं……….

Chatak के द्वारा
June 8, 2010

Nice composition ! I give you 5/5.

    aditi kailash के द्वारा
    June 8, 2010

    चातक जी, आपका आभार………आपने ५/५ दिए सोचकर बहुत अच्छा लगा……..मतलब शायद ये आपको सही में पसंद आई………आपका पुनः धन्यवाद्………

Nikhil के द्वारा
June 8, 2010

उठे हुए कोई सहारा न देता, बाधा हाथ मुंह की है रोटी छीन लेता, कभी सोचता हूँ, कभी पूछता हूँ, धरती पे आखिर इंसान क्यूँ है. बहुत अछि कविता है अदिति जी. आपके अन्दर के कवि को मेरा नमन. धन्यवाद, निखिल झा 149505

    aditi kailash के द्वारा
    June 8, 2010

    निखिल जी, धन्यवाद्………वैसे आप कौन से वाले निखिल हो…………यहाँ दो-दो निखिल हैं तो भ्रम हो जाता है………..

sumityadav के द्वारा
June 8, 2010

अदिती जी, बहुत भावपूर्ण कविता लिखी आपने। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मुझे आपकी मदद की जरूरत थीं। मेरे व्यंग्य और लेख को और बेहतर बनाने और उसकी धार पैनी करने के लिए मुझे सुझाव दीजिए।

    aditi kailash के द्वारा
    June 8, 2010

    सुमित जी, आपका आभार…… तो आप रायपुर के हैं……..अच्छा आप क्या मदद चाहते हैं विस्तार से लिखिए, जितना मुझसे बन पड़ेगा मैं मदद करुँगी……..

    sumityadav के द्वारा
    June 8, 2010

    आपको कैसे मालूम चला कि मैं रायपुर का हूं।  मुझे यह सहायता चाहिए कि मेरे लेख और व्यंग्य में जो भी खामियां हों उनको बताएं और सुधारने का रास्ता सुझाएं तथा उनमें जो खूबियां थी वे भी बताएं ताकि मैं उन्हें और निखार सकूं। धन्यवाद।

    aditi kailash के द्वारा
    June 8, 2010

    सबसे पहले यहीं बात तो आपको सीखनी है……… आप ही ने तो बताया था……… याद कीजिये आप ने कहा लिखा था कि आप रायपुर के हैं…….. आपके विचार बहुत अच्छे हैं, आप को लेखन शैली पर ध्यान देना होगा ………..आपको अन्य अच्छे व्यंग्य पढ़ना होगा और सीखना होगा कि लोग कैसे अपनी बात लिखते हैं……..वैसे विस्तार से मैं आपको बाद में बताउंगी………

    sumityadav के द्वारा
    June 9, 2010

    अदिती जी, याद आया अपने व्यंग्य ला दो मुझे चांद का टुकड़ा में मैंने रायपुर निवासी होना बताया था जिसे राय देना अच्छा लगता है। सहायता एवं टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।

    aditi kailash के द्वारा
    June 9, 2010

    सुमित जी, आप अपने व्यंग्य में और हास्य डालिए……

kaushalvijai के द्वारा
June 8, 2010

wah ! badi shandar rachna hai aapki. plz comments on kaushalvijai.jagranjunction.com

    aditi kailash के द्वारा
    June 8, 2010

    thanks kaushal ji……..


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