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बढती खाई (कविता)

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अमीरों के पास
नहीं बची है जगह
अपना पैसा संजोने की
गरीबों के पास
नहीं बची है जगह
अपना सिर छुपाने की
poverty 1
अमीरों को २० कमरों का
महल भी कम पड़ रहा है
money
और भेज रहे है पैसे
हवाला के खजाने में

povertyगरीबों के मेहनत के २० रुपये
भी नहीं पूरे पड़ते हैं अब
बीवी-बच्चों की
पेट की आग बुझाने में

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RASHID के द्वारा
June 23, 2010

अदिति जी,, यह कविता देख कर एक पुराना गाना याद आता है “जिन्हें नाज़ है हिंद पर वह कहाँ हैं” शायद आप से भी सुना हो !!!

    aditi kailash के द्वारा
    June 24, 2010

    रशीद जी, आपका आभार……….

manoj के द्वारा
June 2, 2010

समाज में प्रतिदिन फैलती भ्रष्टाचार इसी खाई का नतीजा हैं.

    aditi kailash के द्वारा
    June 2, 2010

    सही कहा मनोज जी आपने. भारत में आज गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और अमीर और अमीर. और दोनों वर्गों के बीच इतनी गहरी खाई है जिसे पाटना बहुत मुश्किल है.


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