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इन्सां को बस इन्सां मानो (कविता)

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किस जाति का है वो सूरज
जो रोज सबेरा करता है
किस जाति की है वो चंदा
हर रात उजाला करती हैं

nature

क्या है बोलो उस हवा की जाति
जीव प्राण की रक्षा करती हैं
किस जाति की हैं वो नदियाँ
हरियाली के लिए नित बहती हैं

किस जाति के हैं सुमन वो
खिल बगिया मन हर लेते हैं
क्या है बोलो उस वृक्ष की जाति
फल चाहे बिना फल देते हैं

क्या जाति से है तुम बोलो
इन सबकी अपनी पहचान
जाति नहीं, समर्पण है जो
बनाता है इन सब को महान

जाति से हैं बड़ी योग्यता
उस क्षमता को तुम पहचानो
ना बांटों ब्रह्माण, वैश्य, दलित में
इन्सां को बस इन्सां मानो

equility

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

neha के द्वारा
June 7, 2010

बहुत खूब. जाति से हैं बड़ी योग्यता उस क्षमता को तुम पहचानो ना बांटों ब्रह्माण, वैश्य, दलित में इन्सां को बस इन्सां मानो अच्छी पंक्तियाँ.

    aditi kailash के द्वारा
    June 7, 2010

    नेहा जी, आपके प्रोत्साहन के लिए आभार………

piyush1104 के द्वारा
June 5, 2010

aaj kal to sab jati paat par hi nirbhar karta hai vastav me ham sab bhool gaye hai ki bharat ko aazadi dilane me sabhi ne apna amuly yogdan diya hai .par aaj ki raajneet hi ye sab karva rahi hai hindu muslim aadi sabhi samprday ke log dii hi dil me ekdusre ko bahut pyar karte hai par ye neta log……? ab shayad mujhe aange likhne ki koi jaroorat nahi hai sundar abhivyakti

    aditi kailash के द्वारा
    June 5, 2010

    पियूष जी, आपका पुनः आभार……… आपको फिर से अपने ब्लॉग पर देखकर अच्छा लगा…..उम्मीद है आगे भी टिप्पणियां मिलती रहेगी…… जात-पात, धर्म, संप्रदाय ये सब हम इंसानों के द्वारा ही बनाया गया है और इसे तोड़ना भी हम इंसानों के ही हाथ में हैं……….ये राजनीति का दलदल तब तक साफ़ नहीं हो सकता जब तक हम जाति और पार्टी से ऊपर उठकर, योग्यता के आधार पर नेता नहीं चुनते…….जब सभी नौकरियों के लिए योग्यता की जरुरत होती है, तो भारत के सबसे कमाऊ व्यवसाय के लिए भी तो योग्यता का कुछ मापदंड होना चाहिए……….

ilovepoetry के द्वारा
June 3, 2010

एक बात पूछना चाहता हूँ कि आपको कवितायेँ लिखने कि प्रेरणा कहाँ से मिलती है. मैंने कई बार लिखने कि कोशिश की, पर बहुत अच्छा नहीं लिख पाता हूँ.

    aditi kailash के द्वारा
    June 3, 2010

    प्रेरणा कहाँ से मिलती है? बहुत मुश्किल सवाल है……..अपने आस-पास होने वाली घटनाओं से ही कुछ लिखने का विचार आ जाता है………आप भी लिखते रहिये, धीरे-धीरे अच्छा लिखने लगेंगे……

aashu के द्वारा
June 3, 2010

काश ये बात हर किसी को समझ में आ जाये………

    aditi kailash के द्वारा
    June 3, 2010

    आशु जी, आप भरोसा रखिये…..कभी ना कभी लोग जरुर समझेंगे………

minu के द्वारा
June 3, 2010

अरे वाह, आप तो कवितायेँ भी लिखती हैं……….बहुत अच्छा लिखा है आपने………..लिखते रहिये……….

    aditi kailash के द्वारा
    June 3, 2010

    मीनू जी, आपका आभार…..आपको कविता अच्छी लगी……..बस कभी मन में कोई विचार आता है तो लिख लेते हैं…………

anubhuti के द्वारा
June 1, 2010

जाति से हैं बड़ी योग्यता उस क्षमता को तुम पहचानो ना बांटों ब्रह्माण, वैश्य, दलित में इन्सां को बस इन्सां मानो बहुत अच्छा लिखा है आपने, अगर ये बात लोगों के समझ में आ जाये तो बात ही क्या है.

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    अनुभूति जी, रचनाकार को जब उसकी रचना पर टिप्पणियां मिलती हैं, तो उसे लगता है उसकी मेहनत सफल हो गई. आपको कविता पसंद आई, आभार.

ilovepoetry के द्वारा
June 1, 2010

बहुत अच्छा लिखा है आपने. आजकल जो माहौल बना रखा है लोगों ने उस पर सही प्रहार है. लिखते रहिये.

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    आपका प्रोत्साहन पुनः मिला उसके लिए आपका आभार.

aftab के द्वारा
June 1, 2010

Hiii thanks for this Kavita. Kash ke en kavitaon se kuch logo ko samjh me aati, phir sare jhagde hi khatam ho jate.

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    आफ़ताब जी, इंसान अपने स्वार्थ के आगे कुछ भी सोचने तैयार नहीं है आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद..

samta gupta kota के द्वारा
June 1, 2010

इच्छा तो उसी दुनियां मैं रहने की है जिसका चित्रण आपने किया है,लेकिन अदिति पता नहीं कितने जन्म लेने पड़ेंगे उसके लिए?

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    समता जी, आपने बिलकुल सही कहा. सभी ऐसी ही दुनिया में रहना चाहते हैं, जहाँ न कोई द्वेष हो और न ही लड़ाई-झगड़े, बस हो तो आपस में प्यार. पर ये इंसान ही है जिसने खुद को जात-पात, धर्म, रंग भेद और ना जाने किस-किस चीज़ में बाँट रखा है. इसे बदलना होगा और इसका एक ही हल है कि “इन्सां को बस इन्सां मानो”. आपके प्यार के लिए धन्यवाद. उम्मीद है आगे भी इसी तरह प्रतिक्रियाये मिलती रहेगी.

subhash के द्वारा
June 1, 2010

wonderful poem with great thoughts

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    Subhash ji, Thanks for your encouragement. Really its mean a lot for me.

anil के द्वारा
June 1, 2010

बेहद खुबसूरत कविता,.

    aditi kailash के द्वारा
    June 1, 2010

    अनिल जी, आपको कविता पसंद आई, आभार ! इंसान को उसके काम से पहचाना जाना जाहिए, ना कि जाति से. आपकी योग्यता ही है जो आपको तब भी जीवित रखती है, जब आप इस दुनिया में नहीं होते. अन्य कविताओं पर भी आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा. धन्यवाद्.


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