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साड़ी पर बवाल, तलाक का सवाल-२, एक नारी का जवाब (लेख)

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मैंने अभी अभी अरविन्द जी की पोस्ट साड़ी पर बवाल, तलाक का सवाल पढ़ी. मै उनके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ, पर उनके इस पोस्ट पर कुछ लोगों के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं पढ़कर दुःख भी हुआ. आखिर हम कितने भी आधुनिक क्यों न बन जाएँ, औरतो के प्रति हमारा नजरिया नहीं बदल सकता. जहाँ तक यहाँ बात हो रही थी की साडी पहनने के लिए मजबूर करना तलाक पाने के लिए सही वजह है या नहीं. और अधिकांश लोग इस बात पर चर्चा करने लगे कि औरतों को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं. सबसे पहले मै पोस्ट में पूछे गए सवाल का जवाब देना चाहती हूँ कि सिर्फ साडी पहनने के लिए मजबूर करना तलाक कि वजह नहीं बन सकता.

    अब आगे मै एक नारी होने के नाते बाकी लोगों को जवाब देना चाहती हूँ. कई सारे लोगों ने संस्कृति का हवाला दिया, पर क्या संस्कृति की रक्षा करना सिर्फ महिलाओं का काम हैं? और क्या अपने आराम के लिए सारे नियमों को बदलना आदमी का जन्मसिद्ध अधिकार है? अगर आप हमारी संस्कृति कि बात करते हैं तो उसके मुताबिक आदमियों को धोती-कुर्ता पहनना चाहिए. अब आप ही मुझे बताइए आपके जान पहचान में कितने आदमी हैं जो विशेष मौकों पर ही सही धोती-कुर्ता (कुर्ता-पायजामा नहीं) पहनते हैं? सिर्फ विशेष मौकों पर ही, रोज कि बात तो छोडिये. अच्छा ये बताइए आपमें से कितने लोगों को धोती बांधनी और संभालनी आती है? जब आप अपनी संस्कृति कि रक्षा विशेष मौकों पर भी नहीं कर सकते तो फिर औरतों से क्यों उम्मीद करते हैं कि वो रोज सिर्फ और सिर्फ साड़ी ही पहने.

    किसी को क्या पहनना है या क्या नहीं इसका निर्णय लेने का हक सिर्फ उसी को होना चाहिए, चाहे वो एक औरत हो या एक आदमी. आज जहाँ नारी पुरुषों से कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं. वहीँ वो अपने घर के दायित्वों का भी पूर्ण निर्वाह कर रही हैं. घर से बाहर जाकर काम करना, घर आकर घर के काम करना, बच्चे की देखभाल करना और रिश्तेदारी निभाना आसान काम नहीं होता है. और इस भागदौड़ भरी जिंदगी में आप उससे उम्मीद करते हैं कि रोज वह ५.५ मीटर कि वो साडी लपेट कर रखे तो यह मुमकिन नहीं है. विशेष मौकों पर तो वह खुद ही साडी पहन लेती है. यहाँ बात विशेष मौकों कि नहीं बल्कि रोज की हो रही हैं (कृपया समाचार कि स्कैन कॉपी पढ़ लें). साड़ी नहीं का मतलब सिर्फ जींस पेंट नहीं होता है. क्या आपके घर में औरतें सलवार कुर्ता नहीं पहनती हैं. और अगर जींस पेंट पहन भी रही हैं तो इसमे बुराई क्या है.


    क्या आपको किरण बेदी जी को पेंट शर्ट पहने देखकर बुरा लगता है? नहीं ना. देखिये, ये तो देखने वाले कि नज़रों में होता है वो किस नजरिये से देख रहा है. सलवार कुर्ते और जींस पेंट पहनने में बुराई क्या है? यहाँ मैं एक बात और पूछना चाहूंगी आप लोग ही बताइए कि किस चीज को पहन कर स्त्री ज्यादा ढकी होती है सलवार कुर्ता, जींस पेंट या साड़ी में. आपको जवाब अपने आप मिल जायेगा. कोई भी चीज बुरी नहीं होती. ये तो उपयोग करने वाले पर निर्भर करता है कि वो उसका उपयोग कैसे करता है. अब डंडे का उपयोग कोई सहारा लेने के लिए भी करता है और कोई किसी का सिर फोड़ने में भी, तो डंडा तो बुरा नहीं हो गया ना.


    आप सभी को लग रहा होगा कि बिलकुल मेमसाहब है ये तो (जैसा की कुछ लोगो ने साड़ी की खिलाफत करने वालों के लिए लिखा), पर मैं साडी के खिलाफ नहीं हूँ. ना ही साड़ी पहनना मुझे बुरा लगता है. साड़ी में ही तो नारी सबसे अच्छी लगती है. पर यहाँ बात हो रही है आराम की और बात हो रही है कि कोई दूसरा क्यों ये निर्णय ले कि नारी को क्या पहनना चाहिए या क्या नहीं. कम से कम ये अधिकार तो नारी को होना ही चाहिए.


    संस्कृति के रक्षकों की प्रतिक्रियाओं का विशेष इंतजार रहेगा………..


    साथ ही आप सभी के प्यार का…………


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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' के द्वारा
September 23, 2011

मैडम अदिति जी, नमस्कार| मैंने सम्भवत: आपको पहली बार पढा है| आपने जिस सन्दर्भ में यह आलेख लिखा है, वह मैंने नहीं पढा है, लेकिन आपका प्रस्तुत लेख ही विषय को समझने के लिये परिपूर्ण है| साथ में संस्कृति के रक्षकों और प्यार बिखेरने वालों की प्रतिक्रियाओं को पढने के बाद सबकुछ साफ-साफ समझ में आ जाता है| हॉं अंग्रेजी टिप्पणीकारों एवं उन पर आपके प्रतिउत्तर को अवश्य मैं नहीं समझ सका हूँ, क्योंकि मैं अंग्रेजी में इतनी समझ नहीं रखता| प्रस्तुत विषय पर मुझे भी कुछ कहने की इच्छा है :- १. सर्वप्रथम तो यह धारणा ही गलत है कि स्त्री एवं पुरुष समान हैं| या स्त्री को पुरुष के समान होना चाहिये| अनेक बार तो यहॉं तक कहा जाता है कि ‘क्या मर्द स्त्री है?’ झॉंसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिये इस प्रकार के विश्‍लेषण काम में लिये जाते रहे हैं| इस धारणा ने स्त्री के नैसर्गिग स्त्रैण गुणों को समाप्त करना शुरू कर दिया है| स्त्री केवल स्त्री है| उसे मर्द या पुरुष के जैसे दिखने या होने का कदापि प्रयास नहीं करना चाहिये| स्त्री के लिबास का सवाल केवल लिबास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिकता का अधिक है| मनोविज्ञान ने प्रमाणित किया है कि जैसे ही स्त्री मन पुरुष बनने का प्रयास करता है, वैसे ही स्त्री के स्त्रीत्व का क्षरण होने लगता है| इस बात को बेहतर तरीके से स्त्री ही समझ सकती है! इसके विपरीत भी उतना ही सही है| अर्थात् कोई पुरुष चाहे कितना ही प्रयास कर ले लेकिन वह स्त्री नहीं हो सकता| आखिर क्यों हो? इसलिये स्त्री या पुरुष को एक दूसरे के समकक्ष या समान बनने के लिये यदि लिबास या दिखावे का दिखावा करना पड़े तो यह कतई भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिये| इससे स्त्री का स्त्रीत्व और पुरुष का पौरुष, अवचेतन मन के स्तर पर हीनता का शिकार होता है| जिससे हमारी संतति ही नहीं, हमारा दैनिक जीवन और स्त्री-पुरुष का दाम्पत्य की प्रभावित होता है| २. द्वितीय : जहॉं तक आजादी का सवाल है| आज भारत में हर कोई समान है| सभी को अपनी तरह से जीने, रहने, पहनने, घूमने और खाने का संवैधानिक हक है| भारत के संविधान के अनुच्छेद १४, १९, २१ एवं २५ के प्रकाश में देखें तो हर मानव को अपने तन, मन और अन्तकरण को अपनी इच्छा से जीवित रखने, पल्लवित करने और पुष्पित करने का संवैधानिक मूल अधिकार प्राप्त है| जिसके विरुद्ध बनाया गया कोई भी नियम संविधान के अनुच्छेद १३ (२) के अनुसार शून्य है| फिर भी यदि ऐसी कोई विधि (सामाजिक, धार्मिक या वैधानिक) बनायी या लागू की जाती है तो उसे संविधान के अनुच्छेद ३२ के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में और, या अनुच्छेद २२६ के तहत हाई कोर्ट में चुनौती देकर, उसे असंवैधानिक घोषित करवाने का भी मूल अधिकार प्राप्त है| इस प्रकार कानूनी दृष्टि से देखा जाये तो स्त्री के लिबास को लेकर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का, किसी भी कारण से, किसी को भी कोई हक नहीं रह जाता है| ३. तृतीय : जहॉं तक संस्कृति की रक्षा की बात है तो इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है| कुछ मैं भी लिख देता हूँ| भारत की संस्कृति जिसे हम संसार की सर्वश्रेृष्ठ संस्कृति होने का दावा करते रहते हैं| उसके कुछ ऐतिहासिक उदाहरण हैं :- (१) हमारी संस्कृति युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ का तमगा देती है! लेकिन कौरवसभा में दाव पर लगाई गयी स्त्री ‘द्रोपदी’ से पूछिये कि धर्मराज कहाने वाला युधिष्ठिर क्या एक सच्चा ‘धर्मपति’ या ‘पति’ भी था? (२) रामचरित मानस में साफ लिखा गया है कि असली सीता का रावण ने हरण ही नहीं किया था| (राम सीता से कहते हैं-पढें-तुम पावक महुं करो निवासा! तब तक मैं करूँ निशाचर नाशा!!) यदि यह कहानी सही है तो सीता को अग्नि में प्रवेश करा दिया था और उनकी प्रतिरूप सीता बना दी गयी थी| फिर भी लंका से लौटने के बाद राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा ली गयी थी, जिसके अनुकरण में आज भी नारी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कदम-कदम पर अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है| (३) संस्कृति के रक्षकों के लिये यह सवाल कि श्रेृष्ठ शिक्षकों को ‘द्रोणाचार्य’ सम्मान दिया जाता है| हम सब जानते हैं कि अर्जुन से महान धनुर्धर होने के कारण भील आदिवासी यौद्धा एकलव्य का अंगूठा द्रोणाचार्य ने दक्षिणा के बहाने कटवा लिया था, जबकि द्रोणाचार्य ने एकलव्य को कुछ भी नहीं सिखाया था| आज भील आदिवासी शिक्षक को सरकार द्वारा ‘द्रोणाचार्य सम्मान’ प्रदान करने पर कैसा अनुभव होता होगा? संस्कृति के रक्षकों को इस बात पर विचार करना चाहिये| हमारे कुछ बन्धु देश में परशुराम जयन्ति मनाते हैं, जिसे देखकर क्षत्रियों को कैसा अनुभव होता होगा? (४) संस्कृति के रक्षकों को केवल स्त्री की देह ही संस्कृति की रक्षा के लिये अपरिहार्य क्यों नजर आती है? जब शराब पीकर लड़के सड़क के किनारे लोगों को मोटर साईकल या कार से रौंद देते हैं| जब लोगों की पेंशन या मृतक के परिजनों को नौकरी देने से पूर्व मृतक की विधवा या युवा पुत्री का यौन शौषण किया जाता है, तब संस्कृति का क्षरण नहीं होता है? जब पेट्रोल में कैरोसीन मिलाकर बेचते हैं या नकली दवाई बेचते हैं, बिना रुपये लिये मरणासन्न व्यक्ति का ऑपरेशन नहीं किया जाता, आसानी से हो सकने वाले प्रसव की धन के लालच में सर्जरी की जाती है और सरेआम कन्या भ्रूणहत्या कर दी जातीहै, क्या इससे भारत की संस्कृति का क्षरण नहीं होता? सरेआम टीवी पर एक पार्टी का अध्यक्ष रिश्‍वत लेता दिखाया जाता है, ताबूत खरीद में कमीशन खाया जाता है| मृत सैनिकों के परिजनों के लिये बनाये जाने वाले आवासों को मंत्रियों को आवण्टित कर दिया जाता है| देश का धन विदेशों में जमा करवा दिया जाता है| विवाहों और पार्टियों में टनों खाना बर्बाद कर दिया जाता है| (५) धर्म के नाम पर गरबा नाच के लिये घर से निकलने वाली किशोर लड़कियों को रात्री के अंधेरे में देवी की प्रार्थना के नाच से हटाकर हवश का शिकार बनाया जाता है, जिसके कारण गर्वा डांस समाप्त होने के एक-दो माह बाद, उन क्षेत्रों के क्लीनिकों में गर्भपात कराने वाली अविवाहित लड़कियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो जाती है! क्या इससे भारत की संस्कृति की रक्षा होती है? ४. चतुर्थ : इस सबके बावजूद भी स्त्री की साड़ी से संस्कृति को खतरा या संस्कृति की रक्षा का राग अलापना किस बात का द्योतक है? जो लोग संस्कृति की रक्षा की बढचढकर बात करते हैं, उनका चरित्र जनता के सामने हर दिन आता जा रहा है| कहीं ऐसा तो नहीं कि साड़ी में स्त्री की अस्मत हमला करना अधिक सरल होने के कारण ही संस्कृति के रक्षकों द्वारा साड़ी की वकालत की जाती है| डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’, 0141-2222225, 098285-02666

mithlesh के द्वारा
January 4, 2011

नारी यदि संस्कृति संरक्षण करें तो सांस्कृतिक परिदृश्य में सुखद परिवर्तन निश्चित है । वैसे भी संस्कृति का नारी.के साथ प्रगाढ रिश्ता हैं। नारी के संस्कार, शील व लज्जा से किसी भी देश की सांस्कृतिक पवित्रता बढ़ती है , लेकिन यदि इसके विपरीत होने लगे , नारी का शील उघड़ने लगे , लज्जा वसन छूटने और लुटने लंगे तो सांस्कृतिक प्रदुषण बढ़ता है । इसके कारणो की कई तरह की पड़ताल होती रहती है । इस संबंध में अनेको प्रयास होते रहते हैं , लेकिन मूल बात जो चिंतनीय है , उस पर कम ही लोग चिंतन कर पाते हैं । इस चिंतन का निष्कर्ष यही है कि नारी को स्वयं ही इस स्थिति को सवाँरने के लिए आगे आना होगा । उसे खुद ही आगे बढ़कर यह घोषणा करनी होगी कि उसका शील और संस्कार बिकाऊ नहीं है , फिर विज्ञापन दाता इसकी कितनी ऊँची बोली क्यों न लगाएं ! इसी तरह उसे अपने में ऐसे साहस का संचार करना होगा , जिससे कोई दुष्ट-दुराचारी ऊसकी लज्जा लूटने की हिम्मत ना कर सकें । न्युज चैनल हो या अखबार, अनर्गल विज्ञापनों और नग्न चित्रों से पटे हैं। तेल, साबुन, कपड़ा सभी जगह यही नग्नता। हमारे यहाँ की प्रगतिवादी महिलाएं बस एक ही चिज की माँग करती हैं वह है आजादी, समान अधिकार। मैं भी इनके पक्ष में हूँ लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि इन सब के पिछे ये महिलाएं कुछ चिजो को भुल जा रहीं है। इन्हे ये नहीं दिखता की आजादी को खुलापन कहकर किस प्रकार से इनका प्रयोग किया जा रहा है। चुनाव प्रचार हो या शादी का पंड़ाल छोट-छोटे कपड़ो में महिलाओं को स्टेज पर नचाया जा रहा है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अन्धानुकरण के कारण अपनी मौलिक संस्कृति को लोग नजरंदाज करने लगे हैं। भारतीय जन मानस इसी कारण अलग प्रकार के सोच में ढ़लने लगा है। परिणामत: संस्कृति के प्राण तत्त्व त्याग, बलिदान, सदाचार, परस्परता और श्रमशीलता के स्थान पर पनपने लगी हैं-उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, आलसीपन और स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियां। नई पीढ़ी इनके दुष्प्रभावों के व्यामोह में अपने को लुटाने और बरबाद करने में लग गई है।क्लबों, होटलों, बारों आदि में शराब और विलासिता में लिप्त अपने दायित्व से बेभान यह युवा पीढ़ी देश को कहां ले जायेगी, यह सोच कर ही भय लगता है।आधुनिकीकरण के दुष्प्रभावों से भारतीय नारी भी बच नहीं पाई है। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की उदात्त संस्कृति में पली यह नारी अपने को मात्र सौन्दर्य और प्रदर्शन की वस्तु समझने लगी है। दीवारों पर लगे पोस्टरों और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर मुद्रित नारी-शरीर के कामुक चित्र नारीत्व की गरिमा को जिस प्रकार नष्ट कर रहे हैं वह नारी वर्ग के लिये अपमान की बात है,यहाँ जिम्मेदार यह वर्ग खूद ही है । कोमलता, शील, ममता, दया और करूणा संजोने वाली यह नारी अपनी प्रकृति और अपने उज्जवल इतिहास को भूल कर भ्रूण-हत्या, व्यसनग्रस्तता, अपराध और चरित्रहीनता के भोंडे प्रदर्शन द्वारा अपनी जननी और धारिणी की छवि को धूमिल कर रही है। यह समझ लेने की बात है कि यदि नारी-चरित्र सुरक्षित नहीं रहा तो सृष्टि की सत्ता भी सुरक्षित नहीं रह पायेगी क्योंकि नारी में ही सृष्टि के बीज निहित हैं।

babali के द्वारा
June 9, 2010

क्या अभी तक लोग साड़ी पर ही अटके हैं???????????जिसे जो पहनना है पहनने दो यार, और भी चीज़े हैं सोचने के लिए………

    aditi kailash के द्वारा
    June 9, 2010

    अब इस बात को लोगों ने कुछ कुछ स्वीकार कर लिया है……….आपका आभार……

Rajesh Tiwari के द्वारा
June 5, 2010

I am posting these comments far way from India where sari wearing just likes a making dress joke on Indian tradition; this is a real event which was happen with my wife. After new arrival here she was going to school to leave my children wearing sari one day when she was going to school there is another Indian lady who was wear jeans and shirt from India was commented to my wife that why she was influencing sari culture here as this is Australia, that day when I came from office and she said me she wanted to buy some jeans and shirt for wear I asked her what happen she told me that story, then and there I shopped some jeans and shirt for her, and from that day she has never wear any sari here.

    aditi kailash के द्वारा
    June 5, 2010

    Rajesh ji, Thanks for ur reply. I feel happy to know that u r now away from India but still in touch with this platform…….thats the real culture……….i have read ur incidence……actually rajesh ji when we r vising some new place or say new country, its better to adapt ourself according to that place, otherwise v will be noticed…..when in Rome do as the Romans do………..

rvthakur के द्वारा
June 5, 2010

apani modesty ko dhakne aur mosam se suraksha ke liye vastro kee aawasyakta manav ko huee hogee sesh vivad apnee-apnee bhadas hi…… itne parbhee kisee ko partantrta lagtee ho to vah digambar bhee rah saktahi koee prtibandh nahee hi

    aditi kailash के द्वारा
    June 5, 2010

    आपका आभार….. बाकि सब के अपने-अपने विचार…..

aditi kailash के द्वारा
June 3, 2010

चलिए एक पुरुष को तो हमारी बात समझ आई…..ना हम नारी का पुरुष को नीचा दिखाने के हक में हैं और ना ही नारी को अबला मानते हैं है…..नारी पुरुष तो जूते की जोड़ी के समान हैं, जो एक दुसरे के बिना अधूरे हैं……दोनों को एक साथ चलना चाहिए, एक-दुसरे को समझना चाहिए, खास कर एक-दुसरे की तकलीफों को समझना चाहिए……जिस परिवार में ये दोनों वर्ग एक-दुसरे को सम्मान देते हैं वहीँ परिवार सुखी रहता है…….

    Akhilesh के द्वारा
    June 4, 2010

    हम आपके विचारों से सहमत है. नारी-पुरुष एक दुसरे के बिना अधूरे हैं, जब दोनों साथ-साथ चले तो ही वो पुरे हैं……..

    aditi kailash के द्वारा
    June 4, 2010

    आपका धन्यवाद्………..

minu के द्वारा
June 3, 2010

अभी तक यहाँ एक भी नारी की ना तो आलोचनात्मक प्रतिक्रिया है और ना ही उत्साहवर्धक……..दुःख हुआ………आखिर अदिति जी ने सही ही तो कहा………इस बात की स्वतंत्रता तो किसी को भी होनी ही चाहिए……….

    aditi kailash के द्वारा
    June 3, 2010

    मीनू जी, लगता है आपने मेरी हर एक पोस्ट पढ़ी है……..आपका बहुत बहुत धन्यवाद………आगे भी अन्य पोस्ट पर आपका प्यार पाना चाहूंगी……..

Chaatak के द्वारा
May 28, 2010

अदिति जी, आपके पोस्ट कि सबसे अच्छी दो बातें अंत में मिलीं -   १. संस्कृति के रक्षकों की प्रतिक्रियाओं का विशेष इंतजार रहेगा……….. २. साथ ही आप सभी के प्यार का………… पहला वाला (संस्कृति के रक्षकों कि प्रतिक्रियाएँ) आपको काफी मात्रा में मिल चुका है . दूसरा वाला (प्यार) मेरी तरफ से बहुत सा आपके लिए…….. काफी अच्छा लिखती हैं आप. इतनी साड़ी तो कृष्ण ने द्रौपदी कि भी न बढाई थी जितनी आप लोगों ने एक सरफिरी महिला के अनर्गल मुक़दमे कि बढ़ा दी . अदालत अपना फैसला सुना चुकी है और स्पष्ट कर चुकी है कि इस आधार पर तलाक संभव नहीं, बस बात यहाँ खत्म हो जाती है. आपका लेख अगर हिंदुस्तान कि बेहतरी कि कोई तरकीब बताने वाला होता तो बात ही कुछ और होत. आप एक स्त्री हैं इसलिए आपका ये जानना थोडा आवश्यक होगा - वस्त्र और भोजन में एक चीज़ बिलकुल विपरीत होती है- वस्त्र  पहना जाता है जो दूसरों को भला लगे और भोजन वो किया जाता है जो स्वयं को भला लगे चूँकि मैं संस्कृति के प्रेम वाले पक्ष में अधिक श्रद्धा रखता हूँ इसलिए मैं वस्त्र वही पहनता हूँ जो मेरी प्रेयसी को अच्छा लगता है कमोवेश मेरी प्रेयसी भी उन्ही वस्त्रों कि धारण करती है जो मुझे अच्छे लगते हैं हाँ हम दोनों खाने का आर्डर करते समय अपनी पसंद को तरजीह देते हैं. शायद यही कारण है कि हम दोनों में से कोई भी बुरा खाना खा के बीमार नहीं पड़ता और हम बड़े मजे से जब तब एक दूसरे की पसंद के कपड़ो को पहने आँखों में आँखे डाले नए नए व्यंजनों के आर्डर देते रहते हैं. बात आपको शायद हास्यास्पद लगे लेकिन जो गंभीर मुद्दा आपने उठाया है उसका ये बड़ा आसान सा हल है. आपने नाहक ही साड़ी जैसे ख़ूबसूरत लिबास पर इतनी आक्रामकता व्यर्थ ही उड़ेल दी. इस आग को बचा के रखिये इनकी आवश्यकता सामाजिक मुद्दों पर नहीं राजनैतिक, और सामरिक मुद्दों पर है, 

    aditi kailash के द्वारा
    May 28, 2010

    चातक जी, आपने मेरे लेख का गलत मतलब लगा लिया, मेरा उद्देश्य हंगामा फैलाना नहीं है और ना ही मै साड़ी के खिलाफ हूँ. मैं तो खिलाफ हूँ उन लोगों के जो ये समझते हैं कि समाज में क्या अच्छा है या क्या बुरा इसका निर्धारण करना समाज के एक वर्ग विशेष का काम है. जो दूसरों को क्या कठिनाइयाँ हो रही है उसे नहीं देखता. क्या पहनना चाहिय या क्या नहीं ये पहनने वाले के आराम पर निर्धारित होना चाहिए, ना की समाज के द्वारा. आपने इसका एक आसान सा हल बताया, पर ये इतना आसान नहीं है जितना आपको लगता है. आपने लिखा की आपकी प्रेयसी वहीँ पहनती है जो आप को अच्छा लगता है. तो आपको क्या लगता है कि जो नारियां साड़ी ना पहनकर अन्य वस्त्र धारण कर रहीं हैं वो उनके पति को अच्छा नहीं लगता. आप शायद गलत हैं , उनके पति को अच्छा लगता है तभी वे इसे धारण करती हैं. और पति अपनी पत्नी की परेशानी अच्छी तरह समझता है इसलिए ही वह उसे यह छुट देता है. एक और बात, आप अब जब भी अगली बार अपनी प्रेयसी से मिलें तो, इस लड़ाई का जिक्र किये बिना, उससे पूछियेगा जरुर कि किस वस्त्र में वो ज्यादा आराम महसूस करती हैं. जवाब आपको मिल जायेगा. मैं सिर्फ नारी पर ही नहीं और भी मुद्दों पर लिखती हूँ, शायद आपने मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ा. पढियेगा. आपके इतने सारे प्यार का बहुत-बहुत धन्यवाद. इन प्रतिक्रियाओं से ही लेखक कि कलम में धार आती है. उम्मीद है इसी तरह आपका प्यार आगे भी मिलता रहेगा.

subodh के द्वारा
May 27, 2010

सिर्फ पोशाक से स्त्री की चरित्र का अंदाजा लगाना अपनी गन्दी मानसिक हालत का परिचय देने जैसी बात है जिसे अपना चरित्र दिखाना होता है उसके लिए पोशाक मायने नहीं रखती,लेकिन आज भौतिकता की इस दौड़ में स्त्री जाति का चारित्रिक पतन हुआ है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता,महिलाओं को अपनी जवाबदेही स्वम तय करनी चाहिए क्योंकि आज भी हमारा समाज स्त्री जाति को घर की इज्जत के तौर पर मान्यता देता है और इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता !

    aditi kailash के द्वारा
    May 27, 2010

    सुबोध जी, चारित्रिक पतन तो हुआ है, पर सिर्फ स्त्री जाति का नहीं बल्कि पुरे समाज का हुआ है. मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि आज भी हमारा समाज स्त्री जाति को घर की इज्जत के तौर पर मान्यता देता है. पर इसी समाज के कुछ लोग उसे बाज़ार में बिकने पर मजबूर करते हैं, दहेज़ कि खातिर उसे जला कर मार डालते है. और इससे बड़े दुःख कि बात क्या हो सकती है कि समाज के यहीं ठेकेदार इस जाति विशेष को इस धरती पर कदम भी रखने नहीं देते हैं, कोख में ही मार डालते हैं. आपकी प्रतिक्रिया का बहुत-बहुत धन्यवाद्. आगे भी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
May 27, 2010

बहन जी यहाँ सबसे बड़ी दिक्कत ये है की हमने दूसरों का दोष देखने का चश्मा पहन लिया है, अपनी लड़की या बहन वही ड्रेस पहने तो नज़र ख़राब नहीं होती. लेकिन कोई दूसरी लड़की उसी ड्रेस को पहने तो नज़रें, वृत्ति सब ख़राब होती है, दोष अपनी ख़राब वृत्ति को देने के बजाए हम उस लड़की को देने लगते हैं. बहुत ही उम्दा ब्लॉग है आपका….बहुत ही अच्छी ललकार है.

    aditi kailash के द्वारा
    May 27, 2010

    शिवेंद्र जी, ये ललकार हमेशा कायम रहेगी. आपने बिलकुल सही लिखा है. अपना दोष दूसरों पर थोप देना इंसान की पुरानी प्रवृति रही है. आपको पोस्ट पसंद आई, इसका बहुत बहुत धन्यवाद. उम्मीद है इसी तरह आगे भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा.

subhash के द्वारा
May 27, 2010

duniya mangal par pahunch gyi aap abhi sadi main uljhe hai jiski marji jo pahne

    aditi kailash के द्वारा
    May 27, 2010

    सुभाष जी, आपने बिलकुल सही कहा. दुनिया अब चाँद पर बसने की तैयारी में हैं और हम भारतीय साड़ी में ही उलझे हैं. यहीं तो प्रॉब्लम हैं भारत में. यहाँ के लोगों को पता ही नहीं होता उन्हें किस चीज का विरोध करना चाहिए. नेता भ्रष्टाचार कर रहे हैं, पर हम विरोध नहीं करेंगे. चारों ओर भूख-गरीबी हैं, पर हम विरोध नहीं करेंगे. कोई हमारा हक छीन रहा हैं, पर हम विरोध नहीं करेंगे. हमें न्याय नहीं मिल रहा है, पर हम विरोध नहीं करेंगे. ………………………………………………….. पर नारी साड़ी क्यों नहीं पहन रही है, इसका जरुर विरोध करेंगे. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

Rishabh के द्वारा
May 26, 2010

यदि हर मामले में निर्णय लेने का अधिकार स्त्रियों को सौंप दिया जाए तो एक मूर्खता कहलाएगी. क्या आप चाहेंगी कि पुरुष ऐसी मूर्खता करें? नारी को हमेशा ही संरक्षण की जरूरत है. जिन्होंने अपने घर की स्त्रियों को आजादी दी आज वे भोग रहे हैं. स्त्री कभी भी स्वच्छंद जीवन के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती. आज समाज में जहां भी उनके लिए सहूलियतें पैदा करने की कोशिश की गयी नारियों ने उसका गलत अर्थ समझ अपने लिए विनाश का आमंत्रण कर लिया. अनादि काल से यही शाश्वत सत्य रहा है. यह भी ध्यान रखें कि आज जो लोग नारी मुक्ति आन्दोलन चलाने में सबसे आगे हैं वे अपने घर की औरतों को तो नैतिकता और सदाचार की शिक्षा देते हैं और पराई औरतों को व्यभिचारी बनाने में अपना हितलाभ देखते हैं.

    vats के द्वारा
    May 26, 2010

    जनाब आपने बात घुमा कर कह दी है इसलिए स्पष्टीकरण की जरूरत आ पडी है. शीलवान और कुलवती नारी के लिए किसी वाह्य नियंत्रण या नियम की जरूरत नहीं, उसका चरित्र ही उसका नियामक होता है. आप लोग डरते इसलिए हैं क्योंकि आप को लगता है कि यदि नारी पर लगाम ना लगाई गयी तो वह बर्बाद हो जाएगी. मैं आपसे कहना चाहूंगा कि ऐसा बिलकुल नहीं, आज भी जो स्त्रियाँ अपने दायित्व को समझती हैं वे स्वयम ही गलत काम नहीं करती बल्कि अन्य नारियों के लिए ही अनुकरणीय उदाहरण पेश करती रहती हैं. आज भी चरित्रवान नारियां साड़ी की महता को समझती हैं और बेवजह के अंग दिखाऊ वस्त्रों से परहेज रखती हैं. अदिति जी ने लिखा है कि कोई दूसरा क्यों ये निर्णय ले कि नारी को क्या पहनना चाहिए या क्या नहीं. कम से कम ये अधिकार तो नारी को होना ही चाहिए. इस पर मेरा मानना है अभी उन्हें और अनुभव की जरूरत है.

    aditi kailash के द्वारा
    May 26, 2010

    ऋषभ जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्. किसी ने कहीं लिखा था कि नारी ही नारी कि दुश्मन होती है, पर अगर आप जैसे लोग हैं यहाँ तो किसी और की क्या जरुरत. आज नारी बिना स्वतंत्रता पाए ही हर क्षेत्र में पुरुषों से आगे निकलती जा रहीं हैं, जो आप जैसे पुरुषों के गले नहीं उतर रहीं है. अगर उन्हें निर्णय लेने का हक दिया जाये तो क्या होगा. आप ही बताइए एक लड़की, जो शादी से पहले हर एक क्षेत्र में आगे रहती है, शादी के बाद अपनी पहचान के लिए क्यों तरसती है. जवाब आपको खुद ही मिल जायेगा. आपने लिखा है कि नारी को हमेशा ही संरक्षण की जरूरत है. अब आप ही मुझे बता दे कि किस चीज से संरक्षण कि जरुरत पड़ती है. अगर कोई अपराध होता है तो अपराधी दोषी होता है न कि जिस पर अपराध हुआ है वो.

    aditi kailash के द्वारा
    May 26, 2010

    vats ji, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. मै आपकी कुछ बातों से सहमत हूँ और कुछ से नहीं. आपने बिलकुल सही लिखा कि आज भी जो स्त्रियाँ अपने दायित्व को समझती हैं वे स्वयम ही गलत काम नहीं करती बल्कि अन्य नारियों के लिए ही अनुकरणीय उदाहरण पेश करती रहती हैं. नारी अच्छी तरह समझती है कि उसके लिए क्या अच्छा है या क्या बुरा. पर क्या आपके अनुसार जो नारी साड़ी नहीं पहनती है क्या वो चरित्रवान नहीं है? कृपया इस बात पर एक बार फिर से सोचियेगा. आपके विचार से मुझे अभी कुछ और अनुभव कि जरुरत है. शायद आप सही हों. पर मुझमे इतनी समझ है कि मै अपने विचार खुल कर व्यक्त कर सकूँ. और सिर्फ एक साड़ी पर बवाल मचाना, २१ वीं साड़ी के लोंगों से ये तो उम्मीद नहीं हैं.

Arvind Pareek के द्वारा
May 26, 2010

सुश्री आदिति कैलाश जी, मुझे संबोधित आपके आलेख को मैंनें पढ़ा है । आपने मुझे संबोधित कर मेरे ब्लॉग पर टि‍प्‍पणी करने वालों को जबाव दिया है । मेरे ब्‍लॉग की टिप्‍पणियों पर दिए गए मेरे जबावों से मेरे विचार भी स्पष्ट है । कृपया उन्हें पढ़े तो मुझसे पुछे गए आपके सभी प्रश्नों के उत्तर स्वयं ही मिल जाएंगें । तथापि आपके सुंदर विचारों के लिए साधुवाद । अरविन्द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com

    aditi kailash के द्वारा
    May 26, 2010

    अरविन्द जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. मै उनके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ, पर दूसरों की कुछ प्रतिक्रियाएं पढ़कर मुझे दुःख भी हुआ. और मेरा उद्देश्य इस पोस्ट के द्वारा उनको जवाब देना था. मैं पहले आपके पोस्ट पर ही जवाब दे रही थी, इसलिए वह पोस्ट आपको संबोधित हो गई, जो अब मैंने सुधार ली है. गलती के लिए क्षमा चाहूंगी. मैंने वो सब सवाल आपसे नहीं, बल्कि संस्कृति के रक्षकों से पूछे हैं. अगर आपको मेरे कारण दुःख हुआ हो तो गलती के लिए पुनः क्षमा चाहूंगी.

Arvind Pareek के द्वारा
May 26, 2010

सुश्री आदिति कैलाश जी, मुझे संबोधित आपके आलेख को मैंनें पढ़ा है । आपने मुझे संबोधित कर मेरे ब्लॉग पर टि‍प्‍पणी करने वालों को जबाव दिया है । उक्‍त टिप्‍पणियों पर मेरे जबावों से ही मेरे विचार भी स्पष्ट हो जाते है । कृपया उन्हें पढ़े तो आपके सभी प्रश्नों के उत्तर स्वयं ही मिल जाएंगें । तथापि आपके सुंदर विचारों के लिए साधुवाद । अरविन्द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com and http://indiaeleven.com

zulqurnain Malik के द्वारा
May 26, 2010

Good & sensible reply, we cannot force them to what to wear or not, thats depend on our socity , in our sosity every one is wearing salwar kameez, no need to tell she will realize, she will not wear skirt , if in our socity every one is wearing jeans, she will auto maintain with jeans, dont force them let them decide, todays girls are very jeaneous, she will under stood what to wear, one thing is written very good, when you wear saree your stomach & back is visible, but when you wear salwar kameez its not, so this is the depend on nature of your thinking, your family mentality, my openion wear like dress you feel comfortable, & you can go in front of you elder, without hegitation, without shame, thats it

    Arvind Pareek के द्वारा
    May 26, 2010

    सुश्री आदिति कैलाश जी, मुझे संबोधित आपके आलेख को मैंनें पढ़ा है । आपने मुझे संबोधित कर मेरे ब्लॉग पर टि‍प्पणी करने वालों को जबाव दिया है । मेरे ब्‍लॉग की टिप्‍पणीयों पर दिए गए मेरे जबावों से ही मेरे विचार भी स्पष्ट हो जाते है । कृपया उन्हें पढ़े तो केवल मुझसे पुछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर स्वयं ही मिल जाएंगें । तथापि आपके सुंदर विचारों के लिए साधुवाद । अरविन्द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com and http://indiaeleven.com

    aditi kailash के द्वारा
    May 26, 2010

    Malik ji, Thanx for ur reply on this issue. And thanx, u appreciated my post. Actually in India, everyone wants to impose on others what they want, especially on weaker section and particularly on females. How much higher qualified is woman, but she has no right to take decisions, even on her own matters. What to wear or not, would be the sole choice of the person who is wearing it. If someone feels comfortable in some kind of attires, why others’ have problems. Moreover, if u are not following ur culture properly, then u have no rights to force it on others.

jack के द्वारा
May 26, 2010

साडी भारतीय नारी का पहला और मान्य वस्त्र भी मान गया है आज भी किसी राजनीतिक या अंतराष्ट्रीय सम्मेलन में भरतीय परिधान के तौर पर साडी को हे मह्तवता दी जाती है लेकिन साडी की वजह से अगर महिलाओं को कोए दिक्कत हो जो कार्य स्थल पर अक्सर हो जाती है तो साडी के स्थान पर पश्चिमी परिधान धारण करना भी गलत नही और यह महिलाओं का मामला है जो उन्हें सही लगे वही वह करें आखिर भारत आजद है और क्या स्त्री क्या पुरुष जो चाहे वह जो कर सकता हैं,

    aditi kailash के द्वारा
    May 26, 2010

    जैक जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. मै उनके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ साड़ी पुराने समय से ही समाज के द्वारा मान्य वस्त्र है. पर साथ ही समय के साथ कई चीजे बदलती भी रहती हैं. और अगर कोई अपनी रोजमर्रा कामकाजी जिंदगी में साड़ी में आराम महसूस नहीं करता है तो क्यों उस पर ये थोपी जाये.


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