मुझे भी कुछ कहना है

विचारों की अभिव्यक्ति

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Dr. Aditi Kailash


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क्या मुर्दे भी कभी सोचते हैं

Posted On: 22 Jul, 2012  
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बच्चे दो ही अच्छे………

Posted On: 15 Jul, 2012  
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घर वापसी

Posted On: 14 Jul, 2012  
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तुम मुझसे क्यूं रूठी हो

Posted On: 5 Jul, 2012  
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मैं और मेरा चाँद (कविता)

Posted On: 7 Jul, 2010  
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मेरा पहला-पहला प्यार (लेख)

Posted On: 6 Jul, 2010  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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आखिर जागरण मंच की एकता काम आ ही गई (लेख)

Posted On: 24 Jun, 2010  
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Others न्यूज़ बर्थ में

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ये चोरी नहीं तो और क्या है.. कृपया मेरी मदद करें (लेख)

Posted On: 23 Jun, 2010  
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दो क्षणिकाएं (कविता)

Posted On: 21 Jun, 2010  
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पापा! मेरे लिए महान तुम्हीं हो (कविता)

Posted On: 20 Jun, 2010  
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क्या नारी होना अपराध है ? (कविता)

Posted On: 17 Jun, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अदिति जी नमस्कार ..आपकी ये पंक्तिया पड़कर अभी हाल गोवाहाटी में हुए हादसे की याद हो आई जहा घटना के समय लोग तमाशबीन की तरह तमाशा देख रहे थे कोई लड़की को बचाने के लिए आगे नहीं आया ,पत्रकार भी विडियो बनाने में व्यस्त रहे .,गोवाहाटी ही क्यों ये हादसे रोज़ अख़बार की शोभा बढ़ाते हुए ,इंसानियत को शर्मसार करते हुए दिखेंगे तब लगता है क्या वास्तव में इंसान मुर्दा हो गया है ,जिनके अन्दर कोई भावनाए हलचल नहीं करती ...... ना मैं कुछ देख सकता हूँ ना बोल सकता हूँ और ना ही मैं कुछ सुन सकता हूँ मैं नहीं जानना चाहता क्या हो रहा है मेरे आसपास कौन जिन्दा है और कौन मर रहा मुझमें नहीं है क्षमता सोचने, समझने और कुछ भी बूझने की सोचने समझने का काम तो इंसान करते हैं और मुझे लगता है कि मैं इंसान ही नहीं रहा मैं तो बन गया हूँ बस एक चलता-फिरता मुर्दा और तुम ही कहो मुर्दे भी क्या कभी सोचते हैं उक्त पंक्तिया लिखते समय आपके दिल में क्या ख्याल था पता नहीं पर सच में आपने जो लिखा आज के हालत पर व्यंग करते हुए प्रतीत होते है ...आभार

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: Dr. Aditi Kailash Dr. Aditi Kailash

डॉ अदिति ,सादर प्रणाम | AAPKI बात तो सही हैं पर पूरी तरह मैं सहमत नही हूँ अगर सोचने वाले लोग ना होते तो जे जे पर आप जैसे विद्वानों का सानिध्य ही नही मिलता मैम | एक शायर साहिल साहब कहतें हैं - *************************************** "जीने की आरजू में , मरने लगा है आदमी अपने ही साए से , डरने लगा है आदमी बारूद के ढेर पे बिछा के बिसात ; चाहत उम्रे -दराज़ की ,करने लगा है आदमी . पसमांदा दिमाग , थका हारा बदन आट्मी ताकात का दम , भरने लगा है आदमी सीने में हसद , दिल में जलन अपनी ही आग में , जलने लगा है आदमी तर्जुमानी न कर सका , वेद -ओ -हदीस की मज़हबी जूनून में , मचलने लगा है आदमी न खौफे -खुदा ,न याद -ए-खुदा "साहिल " शैतान की खिदमत सिर्फ , करने लगा है आदमी" *************************************************** हर आदमी को इस जिंदगी की इस दौड़ में टॉप रैंकर भी तो बनना हैं ,पर असंवेदना भी नही ठीक |अच्छी रचनाओ को लिखने के लिए हृदय से आभार | मेरा जीवन - एक कागज की नाव ; इसका इरादा तो केवल नृत्य ही करना है ' समय की लहरों पर , भरपूर नर्तन , निर्भय हो कर न इसे कोई किनारा चाहिए , न मंजिल This paper-boat-life of mine , intend to dance only ; on d waves of time , fearless n in full ; wish neither bank , nor destiny

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: Dr. Aditi Kailash Dr. Aditi Kailash

नमस्कार भाई राजकमल जी, आखिर आज आपने ये मान ही लिया की आप अदिति जी के साथ थे, पिछले वर्ल्ड कप मैं :) और भाई ये फिक्सिंग का आरोप क्यों लगा दिया आपने हम लोगों पर ! मैदान मैं अदितिजी के साथ हमारे जितने भी मुकाबले हुए हैं वनडे, ट्वेंटी - ट्वेंटी चाहे टेस्ट मैच सब अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुसार ही थे, और आगे भी यदि कभी मुकाबला हुआ ( जिसकी गुंजाईश कम है ) तो यकीं जानिए मैच पूरी सिद्दत के साथ ही खेला जायेगा फिक्सिंग के साथ नहीं :) क्यूंकि अबकी बार आपने ये भी घोषणा कर दी है की आप हमारे साथ हो, और साथ नहीं भी हो तो कम से कम न्यूट्रल तो ही हो ! और ये बात हमारी टीम के फेवर मैं जायेगी ! और हाँ अदिति जी भी फाइटर हैं, हमारी तरह तो फिक्सिंग का तो सवाल ही नहीं उठता क्यों अदिति जी ? इसी बात पर एक शेर अर्ज है मुलाहिजा फरमाएं " I am fighter not a fixer dos'nt matter who is the bowler tried to hit a sixer " अंग्रेजी मैं है उर्दू मैं थोडा हाथ तंग है अपना :)

के द्वारा: allrounder allrounder

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

नमस्कार अदिति जी, तो आखिर आपने अपने दो साल के अज्ञातवास का निचोड़ निकाल ही दिया अपने कुशल लेखन से ! किराए का मकान , घर का मकान , यहाँ -वहां से गुगली मारकर ! पर अच्छा लगा की वक्त की दीमक ने आपकी कलम की धार को कम नहीं किया :) ! और आखिर आप अपने परिवार मैं सम्मिलित हो ही गईं, जबकि इस परिवार के कुछ शैतान बच्चे ये सोच कर चिंतित थे की कहीं, उनकी शैतानियों की वजह से उनके परिवार का इतना महत्वपूर्ण सदस्य सदा के लिए तो ये घर परिवार ही नहीं मोहल्ला छोड़ कर ही तो नहीं चला गया :) खैर होते हैं, परिवार मैं कुछ बच्चे शैतान भी होते हैं :) और वे भी अपने साथी को दोबारा यहाँ पाकर बेहद खुश हैं ! पुन: आपका हार्दिक स्वागत है डोक्टर अदिति जी .... आप और अच्छे से अच्छा लिखें और इस मंच को सुशोभित करें यही शुभकामनाये हैं आपके लिए ! धन्यवाद !

के द्वारा: allrounder allrounder

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: Dr. Aditi Kailash Dr. Aditi Kailash

मैडम अदिति जी, नमस्कार| मैंने सम्भवत: आपको पहली बार पढा है| आपने जिस सन्दर्भ में यह आलेख लिखा है, वह मैंने नहीं पढा है, लेकिन आपका प्रस्तुत लेख ही विषय को समझने के लिये परिपूर्ण है| साथ में संस्कृति के रक्षकों और प्यार बिखेरने वालों की प्रतिक्रियाओं को पढने के बाद सबकुछ साफ-साफ समझ में आ जाता है| हॉं अंग्रेजी टिप्पणीकारों एवं उन पर आपके प्रतिउत्तर को अवश्य मैं नहीं समझ सका हूँ, क्योंकि मैं अंग्रेजी में इतनी समझ नहीं रखता| प्रस्तुत विषय पर मुझे भी कुछ कहने की इच्छा है :- १. सर्वप्रथम तो यह धारणा ही गलत है कि स्त्री एवं पुरुष समान हैं| या स्त्री को पुरुष के समान होना चाहिये| अनेक बार तो यहॉं तक कहा जाता है कि ‘क्या मर्द स्त्री है?’ झॉंसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिये इस प्रकार के विश्‍लेषण काम में लिये जाते रहे हैं| इस धारणा ने स्त्री के नैसर्गिग स्त्रैण गुणों को समाप्त करना शुरू कर दिया है| स्त्री केवल स्त्री है| उसे मर्द या पुरुष के जैसे दिखने या होने का कदापि प्रयास नहीं करना चाहिये| स्त्री के लिबास का सवाल केवल लिबास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिकता का अधिक है| मनोविज्ञान ने प्रमाणित किया है कि जैसे ही स्त्री मन पुरुष बनने का प्रयास करता है, वैसे ही स्त्री के स्त्रीत्व का क्षरण होने लगता है| इस बात को बेहतर तरीके से स्त्री ही समझ सकती है! इसके विपरीत भी उतना ही सही है| अर्थात् कोई पुरुष चाहे कितना ही प्रयास कर ले लेकिन वह स्त्री नहीं हो सकता| आखिर क्यों हो? इसलिये स्त्री या पुरुष को एक दूसरे के समकक्ष या समान बनने के लिये यदि लिबास या दिखावे का दिखावा करना पड़े तो यह कतई भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिये| इससे स्त्री का स्त्रीत्व और पुरुष का पौरुष, अवचेतन मन के स्तर पर हीनता का शिकार होता है| जिससे हमारी संतति ही नहीं, हमारा दैनिक जीवन और स्त्री-पुरुष का दाम्पत्य की प्रभावित होता है| २. द्वितीय : जहॉं तक आजादी का सवाल है| आज भारत में हर कोई समान है| सभी को अपनी तरह से जीने, रहने, पहनने, घूमने और खाने का संवैधानिक हक है| भारत के संविधान के अनुच्छेद १४, १९, २१ एवं २५ के प्रकाश में देखें तो हर मानव को अपने तन, मन और अन्तकरण को अपनी इच्छा से जीवित रखने, पल्लवित करने और पुष्पित करने का संवैधानिक मूल अधिकार प्राप्त है| जिसके विरुद्ध बनाया गया कोई भी नियम संविधान के अनुच्छेद १३ (२) के अनुसार शून्य है| फिर भी यदि ऐसी कोई विधि (सामाजिक, धार्मिक या वैधानिक) बनायी या लागू की जाती है तो उसे संविधान के अनुच्छेद ३२ के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में और, या अनुच्छेद २२६ के तहत हाई कोर्ट में चुनौती देकर, उसे असंवैधानिक घोषित करवाने का भी मूल अधिकार प्राप्त है| इस प्रकार कानूनी दृष्टि से देखा जाये तो स्त्री के लिबास को लेकर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का, किसी भी कारण से, किसी को भी कोई हक नहीं रह जाता है| ३. तृतीय : जहॉं तक संस्कृति की रक्षा की बात है तो इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है| कुछ मैं भी लिख देता हूँ| भारत की संस्कृति जिसे हम संसार की सर्वश्रेृष्ठ संस्कृति होने का दावा करते रहते हैं| उसके कुछ ऐतिहासिक उदाहरण हैं :- (१) हमारी संस्कृति युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ का तमगा देती है! लेकिन कौरवसभा में दाव पर लगाई गयी स्त्री ‘द्रोपदी’ से पूछिये कि धर्मराज कहाने वाला युधिष्ठिर क्या एक सच्चा ‘धर्मपति’ या ‘पति’ भी था? (२) रामचरित मानस में साफ लिखा गया है कि असली सीता का रावण ने हरण ही नहीं किया था| (राम सीता से कहते हैं-पढें-तुम पावक महुं करो निवासा! तब तक मैं करूँ निशाचर नाशा!!) यदि यह कहानी सही है तो सीता को अग्नि में प्रवेश करा दिया था और उनकी प्रतिरूप सीता बना दी गयी थी| फिर भी लंका से लौटने के बाद राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा ली गयी थी, जिसके अनुकरण में आज भी नारी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कदम-कदम पर अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है| (३) संस्कृति के रक्षकों के लिये यह सवाल कि श्रेृष्ठ शिक्षकों को ‘द्रोणाचार्य’ सम्मान दिया जाता है| हम सब जानते हैं कि अर्जुन से महान धनुर्धर होने के कारण भील आदिवासी यौद्धा एकलव्य का अंगूठा द्रोणाचार्य ने दक्षिणा के बहाने कटवा लिया था, जबकि द्रोणाचार्य ने एकलव्य को कुछ भी नहीं सिखाया था| आज भील आदिवासी शिक्षक को सरकार द्वारा ‘द्रोणाचार्य सम्मान’ प्रदान करने पर कैसा अनुभव होता होगा? संस्कृति के रक्षकों को इस बात पर विचार करना चाहिये| हमारे कुछ बन्धु देश में परशुराम जयन्ति मनाते हैं, जिसे देखकर क्षत्रियों को कैसा अनुभव होता होगा? (४) संस्कृति के रक्षकों को केवल स्त्री की देह ही संस्कृति की रक्षा के लिये अपरिहार्य क्यों नजर आती है? जब शराब पीकर लड़के सड़क के किनारे लोगों को मोटर साईकल या कार से रौंद देते हैं| जब लोगों की पेंशन या मृतक के परिजनों को नौकरी देने से पूर्व मृतक की विधवा या युवा पुत्री का यौन शौषण किया जाता है, तब संस्कृति का क्षरण नहीं होता है? जब पेट्रोल में कैरोसीन मिलाकर बेचते हैं या नकली दवाई बेचते हैं, बिना रुपये लिये मरणासन्न व्यक्ति का ऑपरेशन नहीं किया जाता, आसानी से हो सकने वाले प्रसव की धन के लालच में सर्जरी की जाती है और सरेआम कन्या भ्रूणहत्या कर दी जातीहै, क्या इससे भारत की संस्कृति का क्षरण नहीं होता? सरेआम टीवी पर एक पार्टी का अध्यक्ष रिश्‍वत लेता दिखाया जाता है, ताबूत खरीद में कमीशन खाया जाता है| मृत सैनिकों के परिजनों के लिये बनाये जाने वाले आवासों को मंत्रियों को आवण्टित कर दिया जाता है| देश का धन विदेशों में जमा करवा दिया जाता है| विवाहों और पार्टियों में टनों खाना बर्बाद कर दिया जाता है| (५) धर्म के नाम पर गरबा नाच के लिये घर से निकलने वाली किशोर लड़कियों को रात्री के अंधेरे में देवी की प्रार्थना के नाच से हटाकर हवश का शिकार बनाया जाता है, जिसके कारण गर्वा डांस समाप्त होने के एक-दो माह बाद, उन क्षेत्रों के क्लीनिकों में गर्भपात कराने वाली अविवाहित लड़कियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो जाती है! क्या इससे भारत की संस्कृति की रक्षा होती है? ४. चतुर्थ : इस सबके बावजूद भी स्त्री की साड़ी से संस्कृति को खतरा या संस्कृति की रक्षा का राग अलापना किस बात का द्योतक है? जो लोग संस्कृति की रक्षा की बढचढकर बात करते हैं, उनका चरित्र जनता के सामने हर दिन आता जा रहा है| कहीं ऐसा तो नहीं कि साड़ी में स्त्री की अस्मत हमला करना अधिक सरल होने के कारण ही संस्कृति के रक्षकों द्वारा साड़ी की वकालत की जाती है| डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 0141-2222225, 098285-02666

के द्वारा:

तमाम कायनात की है शान बेटिया, फिर भी हर बात में है परेशान बेटिया! गाव की गलिओ से चली है पहाड़ो पर, छुकर दिखा चुकी है आसमान बेटिया!! बेटा करे न करे कोई गरज नहीं मगर ,रख लेती है माँ बाप का सम्मान बेटिया! बेटा ये कह रहा अभी हवा चल रही ,और हवाओ से भर रही उड़ान बेटिया!! खिलने के पहले कलिओ को मत मसलिये, हो जाती है हँसते हँसते बलिदान बेटिया! जिसके नहीं है बेटे अफ़सोस न करे, पंहुचा रही है अर्थी को समशान बेटिया!! निशा जो मिट गया तो भटकते रहेगे हम, विश्व के विकास का निशान है बेटिया! मंदिर की आरती है कभी, कभी है घंटिया, ज़रा गौर से सुनो तो आजान है बेटिया!! फसल बेटियों की अब सब उगाइये ,गीता है किसी घर की कही कुरान है बेटिया! जैसे भी हो आ जाती है मिलने के लिए ,बाबुल से नहीं होती कभी अनजान बेटिया!! नया कुछ तो कर रही है जहाँ के लिए, परिवार की बन चुकी पहचान बेटिया! रितेश अग्रवाल(मोदी) एडवोकेट एवम सदस्य जिला सलाहकारी समिति पी सी & पी एन डी टी एक्ट कमेटी जिला नरसिंगपुर म.प्र.

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नारी यदि संस्कृति संरक्षण करें तो सांस्कृतिक परिदृश्य में सुखद परिवर्तन निश्चित है । वैसे भी संस्कृति का नारी.के साथ प्रगाढ रिश्ता हैं। नारी के संस्कार, शील व लज्जा से किसी भी देश की सांस्कृतिक पवित्रता बढ़ती है , लेकिन यदि इसके विपरीत होने लगे , नारी का शील उघड़ने लगे , लज्जा वसन छूटने और लुटने लंगे तो सांस्कृतिक प्रदुषण बढ़ता है । इसके कारणो की कई तरह की पड़ताल होती रहती है । इस संबंध में अनेको प्रयास होते रहते हैं , लेकिन मूल बात जो चिंतनीय है , उस पर कम ही लोग चिंतन कर पाते हैं । इस चिंतन का निष्कर्ष यही है कि नारी को स्वयं ही इस स्थिति को सवाँरने के लिए आगे आना होगा । उसे खुद ही आगे बढ़कर यह घोषणा करनी होगी कि उसका शील और संस्कार बिकाऊ नहीं है , फिर विज्ञापन दाता इसकी कितनी ऊँची बोली क्यों न लगाएं ! इसी तरह उसे अपने में ऐसे साहस का संचार करना होगा , जिससे कोई दुष्ट-दुराचारी ऊसकी लज्जा लूटने की हिम्मत ना कर सकें । न्युज चैनल हो या अखबार, अनर्गल विज्ञापनों और नग्न चित्रों से पटे हैं। तेल, साबुन, कपड़ा सभी जगह यही नग्नता। हमारे यहाँ की प्रगतिवादी महिलाएं बस एक ही चिज की माँग करती हैं वह है आजादी, समान अधिकार। मैं भी इनके पक्ष में हूँ लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि इन सब के पिछे ये महिलाएं कुछ चिजो को भुल जा रहीं है। इन्हे ये नहीं दिखता की आजादी को खुलापन कहकर किस प्रकार से इनका प्रयोग किया जा रहा है। चुनाव प्रचार हो या शादी का पंड़ाल छोट-छोटे कपड़ो में महिलाओं को स्टेज पर नचाया जा रहा है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अन्धानुकरण के कारण अपनी मौलिक संस्कृति को लोग नजरंदाज करने लगे हैं। भारतीय जन मानस इसी कारण अलग प्रकार के सोच में ढ़लने लगा है। परिणामत: संस्कृति के प्राण तत्त्व त्याग, बलिदान, सदाचार, परस्परता और श्रमशीलता के स्थान पर पनपने लगी हैं-उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, आलसीपन और स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियां। नई पीढ़ी इनके दुष्प्रभावों के व्यामोह में अपने को लुटाने और बरबाद करने में लग गई है।क्लबों, होटलों, बारों आदि में शराब और विलासिता में लिप्त अपने दायित्व से बेभान यह युवा पीढ़ी देश को कहां ले जायेगी, यह सोच कर ही भय लगता है।आधुनिकीकरण के दुष्प्रभावों से भारतीय नारी भी बच नहीं पाई है। 'सादा जीवन, उच्च विचार' की उदात्त संस्कृति में पली यह नारी अपने को मात्र सौन्दर्य और प्रदर्शन की वस्तु समझने लगी है। दीवारों पर लगे पोस्टरों और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर मुद्रित नारी-शरीर के कामुक चित्र नारीत्व की गरिमा को जिस प्रकार नष्ट कर रहे हैं वह नारी वर्ग के लिये अपमान की बात है,यहाँ जिम्मेदार यह वर्ग खूद ही है । कोमलता, शील, ममता, दया और करूणा संजोने वाली यह नारी अपनी प्रकृति और अपने उज्जवल इतिहास को भूल कर भ्रूण-हत्या, व्यसनग्रस्तता, अपराध और चरित्रहीनता के भोंडे प्रदर्शन द्वारा अपनी जननी और धारिणी की छवि को धूमिल कर रही है। यह समझ लेने की बात है कि यदि नारी-चरित्र सुरक्षित नहीं रहा तो सृष्टि की सत्ता भी सुरक्षित नहीं रह पायेगी क्योंकि नारी में ही सृष्टि के बीज निहित हैं।

के द्वारा: mithlesh mithlesh

कुछ दिनों पहले ही करीब १ महीने बाद मैं अपनी कर्मभूमि में वापस लौटी थी. एक दो दिन बाहर खाना खा कर बोर हो गई तो सोचा बाज़ार जाकर जरुरत का कुछ सामान ले आऊं. जूट की थैली हाथ में लिए, अपनी स्कूटी पर सवार हो निकल पड़ी बाज़ार की ओर. किराने की दुकान में घुसते ही लगा की आज फिर दुकान वाला हमें, हमारे ना चाहते हुए, अपनी लाल, पीली, हरी, नीली पॉलीथीन की थैलियाँ थमा देगा. पर ये क्या, आज तो माहौल कुछ बदला- बदला नजर आ रहा था. दुकान वाला हमे कागज के लिफाफों में सामान दे रहा था. हमें अन्दर से बहुत ख़ुशी हुई, पर दुकान वाले से हमने कुछ पूछा नहीं और आगे बढ़ चले सब्जी मंडी की ओर. यहाँ का दृश्य देखकर तो हमारी हंसी ही छुट गई. कोई अपने बड़े रुमाल में सब्जी ले रहा था, तो कोई अपने आँचल में सब्जी संजो रहा था. दुकान वाले भी हमें कागज की थैलियों में सब्जी दे रहे थे. आखिर हमसे नहीं रहा गया तो हमने एक सब्जी वाले से पूछ ही लिया कि आखिर माजरा क्या है. हमारी बात सुनकर वो हमे यूँ देखने लगा मानो हमने उसकी सारी संपत्ति छीन ली हो और मुहं बनाते हुए बोला कि मैडम जी आपको पता नहीं है नगर पालिका ने पॉलीथीन कि थैलियों को बैन कर दिया है. उसकी बातें सुनकर दिल में आया कि उसे सब्जी के दुगुने पैसे दे दूँ. सोचकर ख़ुशी हुई कि चलो देर से ही सही आखिर हमारे छोटे से नगर के कर्ता-धर्ताओं कि नींद तो खुली और उन्होंने इस पर्यावरण में जहर घोलती पॉलीथीन के उपयोग पर रोक तो लगाई. पर क्या ये सफल हो पायेगा, राम भरोसे है. हम सब की कहानी इंसान ने अपनी सुविधाओं के लिए हमेशा से कई ऐसी चीजे बनाई हैं, जो कुछ सालों बाद उसके ही जी का जंजाल बन गये है, पॉलिथीन की थैलियाँ भी उनमे से ही एक हैं. ये लाल, पीली, हरी, नीली थैलियाँ आपकों हर जगह दिखाई देंगी, चाहे वो किराने वाले की दुकान हो, बड़े-बड़े सुपरबाज़ार हों, सब्जी मंडी हों या छोटा सा पान का ठेला. ये थैलियाँ जहाँ हमारे पर्यावरण के लिए घातक हैं, वही हमारे स्वास्थ्य पर भी इनका बुरा असर पड़ता हैं. आज का पढ़ा लिखा इंसान सब कुछ जानते हुए भी आँख मूंदकर इनका बेहिसाब इस्तेमाल कर रहा है. क्या है पॉलिथीन पॉलीथीन एक पेट्रो-केमिकल उत्पाद है, जिसमें हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होता है। रंगीन पॉलीथीन मुख्यत: लेड, ब्लैक कार्बन, क्रोमियम, कॉपर आदि के महीन कणों से बनता है, जो जीव-जंतुओं व मनुष्यों सभी के स्वास्थ्य के लिए घातक है। कितनी घातक हैं ये पॉलिथीन की थैलियाँ मिटटी को खतरा ये पॉलिथीन की थैलियाँ जहाँ हमारी मिटटी की उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं, वहीँ मिटटी में इनके दबे रहने के कारण मिटटी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ा है. सीवरेज की समस्या सफाई व्यवस्था और सीवरेज व्यवस्था के बिगड़ने का एक कारण ये पॉलीथीन की थैलियाँ हैं जो उड़ कर नालियों और सीवरों को जाम कर रहीं हैं. स्वास्थ्य पर खतरा पॉलीथीन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है। इतना ही नहीं, यह गर्भस्थ शिशु के विकास को भी रोक सकता है. पर्यावरण को खतरा प्लास्टिक और पॉलीथीन पुनः चक्रित हो सकते हैं पर इसे पूरी तरह खत्म होने में हज़ारों वर्ष लग जाते हैं. इसी कारण हमारी जमीन और नदियाँ, हमारे द्वारा उपयोग की गई इन पॉलीथीन की थैलियों से अटी पड़ी हैं. जब ये पॉलीथीन कचरे के ढेर के साथ जलाये जाते हैं, तब इनसे जहरीली गैसे निकलती हैं. इतना ही नहीं इनसे निकलने वाला धुआं ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचा रहा है, जो ग्लोबल वार्मिग का बड़ा कारण है. जानवरों को खतरा ये थैलियाँ जहाँ मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेय है, वहीँ थल व जल में रहने वाले जीव-जंतुओं के जीवन को भी खतरे में डाल रहीं है. पशुओं के द्वारा खा लेने पर ये उनके पेट में जमा हो रही हैं और उनकी जान के लिए खतरा बन रही है. हर साल इन थैलियों को खाकर लाखों जानवर मारे जाते हैं। कई जानवरों के पेट से ऑपरेशन कर करीब ५०-१०० किलो तक पॉलिथीन निकाली गई है. कैसे रोके ये खतरा bags # पॉलिथीन की थैलियों की जगह कपडे या जूट की थैलियाँ इस्तेमाल में लायें. # स्थानीय प्रशासन भी पॉलिथीन के उपयोग पर रोक लगायें और इसका कड़ाई से पालन करें. # पॉलिथीन देने वालों और लेने वालों दोनों पर जुर्माना किया जाये, जैसा की कुछ राज्यों में किया भी जा रहा है. नई पहल हिमाचल प्रदेश उत्तरी भारत का पहला राज्य है, जिसने पॉलीथीन कचरे से एक किलोमीटर से अधिक लंबी सड़क को पक्का करने के लिए उपयोग में लाया है. अभी तक हिमाचल प्रदेश में 1,381 क्विंटल पॉलीथीन कचरा एकत्रित किया जा चुका है. इस पॉलीथीन कचरे का उपयोग लगभग 138 किलोमीटर सड़क के निर्माण में किया जाएगा. ये एक बहुत अच्छी पहल है. जहाँ इससे ये पॉलीथीन कचरा उपयोग में आएगा, वहीँ हमारे गांवों को कुछ किलोमीटर सड़क मिल जाएगी. अन्य राज्यों को भी इससे कुछ सीख लेनी चाहियें. कानून बनते हैं और टूटते हैं, लेकिन पर्यावरण को बचाने और उसकी देखभाल का जिम्मा हम सब के ऊपर है। सरकार तब तक बहुत कुछ नहीं कर सकती, जब तक कि हम स्वयं ये दृढ संकल्प न ले ले कि आज से हम पॉलिथीन उपयोग में नहीं लायेंगे. यदि सभी लोग पॉलीथीन के खिलाफ जागरूक होकर अभियान छेड़ दें और इसका इस्तेमाल खुद ही त्याग दें, तो वो दिन भी जरुर आएगा जब किसी भी दुकान पर ये जहरीली थैलिया नहीं दिखाई देंगी. यदि आज हम पर्यावरण की देखभाल नहीं करेंगे तो वह दिन भी दूर नहीं जब इस दुनिया का अंत करीब आ जायेगा और हम सब सिर्फ हाथ मलते रह जायेंगे.

के द्वारा:

अदिति जी ..एक जगह आपने कहा था की मेरी एक टिपण्णी आपको अच्छी नहीं लगी ... उसके बारे में यह कहना चाहता हू की मेरी वोह पोस्ट बेशक सबके लिए थी ... लेकिन उसको पड़ा तो बस तीन ही लोगो ने था ... हाँ मुझसे यह गलती जरुर हुई है की मैने तीसरे शख्श निखिल जी का नाम नहीं लिया ... अब जब उसको पड़ा ही कुलमिला कर सर्फ तिन ही लोगो ने तो बाकी के बारे में में क्या जानू... कोई अगर अपना कीमती समय निकल कर मेरे लिखे हुए को पड़ता है ... फिर चाहे वोह कुछ भी कहता हो ..मेरे लिए तो उसका कहा मायने रखता ही है ... मैं उसका शुक्रगुज़ार हूँगा न की एहसानफरामोश .... वेसे मेरे हर लिखे लेख को २-४ लोग ही पड़ते है ... तो क्या मैं यह सोच कर लिखना ही छोड़ दू .... शायद नहीं ...

के द्वारा: rajkamal rajkamal

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

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जानकारी भरा आलेख... वैसे मैं ब्लॉग लिखने के लिए "windows live writer " टूल का इस्तेमाल करता हूँ...इस पर लिखने के लिए आपका नैट से जुड़ा होना ज़रुरी नहीं है...आप ऑफ लाइन मोड में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं| हाँ!...पोस्ट लिखने के बाद उसे पब्लिश करने के लिए आन लाइन होना ज़रुरी है| जागरण जंक्शन के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं इसका मुझे ज्ञान नहीं है लेकिन live writer se likh kar बाद में उसके कापी-पेस्ट कर के जहाँ मर्ज़ी पोस्ट किया जा सकता है...जागरण जंक्शन पर भी | इस टूल से वो सभी कुछ किया जा सकता है जो ब्लॉग लिखने के लिए बहुत ज़रुरी है जैसे...रंगों का चयन ...आडियो-वीडियो जोड़ना...फॉण्ट का साईज छोटा-बड़ा करना...ये नैट पर मुफ्त में उपलब्ध है| इसका एक फायदा ये भी है कि आप इस पर जितने चाहें उतने ब्लॉग जोड़ सकते हैं...और बारी-बारी से सभी पर अपनी पोस्ट को पब्लिश कर सकते हैं...और हाँ...अगर आपके पास ऑफ लाइन मोड में हिंदी लिखने का जुगाड नहीं है तो आप इसे गूगल की साईट से hindi transliteration tool को मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं...इसे इस्तेमाल करना बहुत ही आसान है....उसके बाद बाद हिंदी में चैट वगैरा भी कर पाएंगे ...अगर कोई दिक्कत हो तो आप मुझे rajivtaneja2004@gmail.com पर मेल भी भेज सकते हैं

के द्वारा: राजीव तनेजा राजीव तनेजा

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आपके ब्लॉग पर ये वास्तव में मेरी पहली प्रतिक्रिया है ये तो खुद मुझे भी नहीं पता लेकिन आपके कई ब्लॉग पढ़े है ! आपके बाउंसर और आपकी नारी आधारित कविता भी पढ़ी थी गलती से कमेन्ट करना भूल गई होंगी उसके लिए में माफ़ी मांगती हूँ ! दरअसल दिन भर में कुछ १५ से २० ब्लॉग पढने की आदत लग चुकी है कई बार पढ़ते पढ़ते ध्यान नहीं रहता की किस पर कमेन्ट किया और किस पर नहीं बल्कि एक बार तो किसी और का कमेन्ट किसी और के ब्लॉग पर कर दिया ! लेकिन अब अपनी इन आदतों को सुधारते हुए यहाँ कमेन्ट करना शुरू किया है शुरुआत सचिन जी के ब्लॉग से हुई है उनके एक महीने पहले डाले गए बाउंसर का जवाब अब दिया है वैसे आपके पिछले पढ़े हुए ब्लॉग पर ज़ल्द ही कमेन्ट करुँगी ! आपके कमेन्ट तो मुझे मिलते ही रहते है ! उसके लिए आपका आभार ! and all the best for the final result

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अरे यार हो गया न पंगा ! अदितिजी की बातों से मुझे गुस्से की बू आ रही है, इसलिए मैं अपनी पहेलियाँ - बहेलियन छोड़ कर सीधे मुद्दे पर आता हूँ ! अदिति जी क्या है कि बचपन से मुझे लोगों के Interview लेने का बड़ा शौक है, और मैं अपने कल्पलिक S D चैनल पर झूठे interview छापता रहता हूँ, जैसा कि Breaking News मैं आपका भी प्रकाशित किया था, किन्तु मैं चाहता हूँ कि जब आप No 1 बने तो मैं आपका असली Interview अपने इस काल्पनिक चैनल पर प्रकाशित करूँ, Interview सिर्फ इस मंच से सम्बंधित होगा, अगर कहीं भी आपको कुछ व्यक्तिगत लगे तो आप उस प्रश्न का जवाव न देने के लिए स्वतंत्र है ! और ये बिलकुल गंभीरता से लिया जायेगा मजाकिया नहीं ! अगर आप No बनी तो क्या आप हमारे चैनल को Interview देंगी ! अगर इस लिए लगा दिया कि मैच अभी ख़तम नहीं हुआ ! तुम्हारे कछुआ चाचा अभी दौड़ मैं हैं ! धन्यबाद !

के द्वारा: allrounder allrounder

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विवेक जी, सबसे पहले तो आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार.... जब हमने कोई गलत काम किया ही नहीं तो हमें बुरा क्यों लगेगा...शायद आप इस मंच पर नए हैं, इसलिए आपके मन में इस तरह का सवाल आया.... तो आपको लगता है कि हमने प्रचार पाने के लिए ये चोरी करवाई, तो इसका जवाब है ..... १. प्रचार पाना होता तो ये हम कांटेस्ट ख़त्म होने से पहले करते ना कि बाद में (और आपको पता नहीं है शायद कि कांटेस्ट १५ जून को ही ख़त्म हो गया है).... २. हमें प्रचार पाने के लिए ऐसे सस्ते हथकंडे अपनाने कि जरुरत नहीं हैं (ये हम समय आने पर बता देंगे कि हमारे पास प्रचार के क्या-क्या साधन उपलब्ध थे और जिनका हमने उपयोग नहीं किया)... ३. अगर वो ब्लॉग नहीं है तो उसने अपना ब्लॉग डिलीट कर दिया होगा, ये बहुत ही आसान होता है... ४. चोर महाशय ने अगर सिर्फ हमारे ब्लॉग पर ही माफ़ी मांगी और अन्य पर नहीं, क्योंकि विरोध भी सिर्फ हमने ही किया था सचिन जी ने नहीं, उन्होंने तो तो अपना ब्लॉग वहां देखा भी नहीं.... आप शायद जानते होंगे माँ भी अपने बेटे को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक उसे भूख से उसके रोने कि आवाज़ नहीं सुनाई देती.... उम्मीद है अब आपको दाल काली नहीं पीली ही दिखाई दे रही होगी.... और अगर इसके बाद भी आपको वर्नान्धता हों तो हम कुछ नहीं कर सकते...

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

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भाई राजकमल, आपके सहयोग का बहुत धन्यबाद आप सब लोगों के प्रयास से अदितिजी अपनी रचनाएँ उस साहित्य के बिल लादेन से आज़ाद करने मैं कामयाब रहीं ! इस बहाने मुझ गरीब की अपहृत रचना भी उस अपहरनकर्ता के चंगुल से मुक्त हुई ! रही पुरानी बातों की और मेरा नाम व्यंग में इस्तेमाल करने की तो इसके लिए हमें किसी की इज़ाज़त लेने या माफ़ी मांगने की आवश्यकता नहीं है, मैं और तुम और बाकी साथी सब एक ही परिवार के सदस्य हैं ! परिवार के लोगों मैं कभी - कभी मतभेद तो हो सकते हैं मगर मनभेद कभी नहीं होना चाहिए ! हमें यहाँ पर एक दुसरे पर किये हुए व्यंगों को सद्भावना से देखना चाहिए न की दुर्भावना से ! जहाँ तक प्रश्न मेरा है मेरे मन मैं अपने किसी भी साथी के लिए कोई दुर्भावना नहीं रहती, दूसरों की दूसरा जाने ! मैं जिस पर भी व्यंग करता हूँ, वो यहाँ मेरा मित्र ही है ! और तुम भी उनमें से एक हो ! एक बार फिर आप सभी महानुभावों का धन्यबाद !

के द्वारा: allrounder allrounder

प्रिय अदिति, आपने ने कहा है की एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है ! यहाँ पर मैं एक बात और कहना चाहूँगा की प्रतियोगिता को भी सभी लेखकों को इर्ष्या के भाव से लेना चाहिए “जलन” के भाव से नहीं ! इर्ष्या इस बात की होनी चाहिए की मैं भी अच्छा से अच्छा लिखूं और आगे बढूँ ! टांग खिचाई नहीं होनी चाहिए ! किसी से द्वेष भाव नहीं होना चाहिए ! यदि किसी की रचना अच्छी है तो उसे अच्छी ही कहा जाना चाहिए ! चाहे वो रचना किसी की भी हो ! बाकी जितने भी महानुभाव इस मचंह पर है सभी समझदार है ! किसी को ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है ! आशा है मेरी बात को आन्यथा नहीं लेंगे ! धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA R K KHURANA

चातक जी, हम सब यहाँ एक परिवार की तरह ही तो हैं, जो अपना सुख-दुःख बांटते हैं ....आपका दोहा बिलकुल ही सटीक है.... आपने ये बात भी सही कही, इस अभिजात्य वर्ग की कमी कई बार खल जाती है.....हमने कल ही जागरण टीम को भी मेल किया था इस सम्बन्ध में, पर उधर से भी कोई जवाब नहीं आया.....कई बार जागरण मंच पर कई नए ब्लोगर की पोस्ट बहुत ही अच्छी होती है, पर ये अभिजात्य वर्ग हमेशा अपनी प्रतिक्रिया देने से कतराता है, जबकि होना ये चाहिए कि वो उभरते रचनाकारों को प्रोत्साहित करें.... एक दूरी सी कायम की गई है दोनों वर्गों के बीच....कई बार तो, या यूँ कहें हमेशा ही, जब उनके पोस्ट पर भी प्रतिक्रिया दें तो भी जवाब नहीं आता है... और फीडबैक पर भी जवाब नहीं मिलता है....बस चल रहा है किसी तरह...

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

अदिति जी, आपका लेख जब कापी-कैट के ब्लॉग से नदारद दिखा तो दिली ख़ुशी सारे ही जागरण ब्लोगर परिवार को हुआ | जो एकजुटता देखने को मिली वो बेमिसाल थी | मैंने महसूस किया कि इस एकजुटता में हमने अपने लिए अनजाने में एक नाम खोज लिया 'जागरण जंक्शन परिवार' कमी सिर्फ एक बात की रही कि इस परिवार के आधे (मैं उन्हें अभिजात्य सदस्य कहूँगा) यानी जागरण ब्लॉग के सदस्यों की कोई मौजूदगी नहीं रही | सिर्फ रीडर ब्लॉग के सदस्य ही एकजुट थे| खैर कोई बात नहीं ! हम तो संगठित हैं | एक और दोहा याद आ गया | रहा नहीं जा रहा, लिख देता हूँ (व्यंग है कोई इसको सीरियसली मत लीजियेगा)- रहिमन विपदा की भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत में जान पडत सब कोय |

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आप सभी के हम बहुत ही शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी परेशानी को अपनी परेशानी समझ कर साथ दिया और तब तक लड़ते रहे, जब तक कि बुराई हार ना जाये... तो देखिये हम सब की एकता की ताकत के आगे बुराई आखिर हार ही गई, अरे भाई उस चोर ने अपने ब्लॉग से इस मंच की रचनाएँ हटा ली है...तो अब हम खुश हैं और आप सभी भी हो जाइये..... इस मंच पर यहीं तो बात अच्छी लगती है कि एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है….और किसी एक का दुःख सबका होता है….ये मंच एक परिवार ही है….और भगवान से प्रार्थना है कि सभी के बीच ये स्नेह हमेशा बनाये रखे… पर हम सभी को अभी कुछ काम और करने होंगे....हमें इस समस्या का ठोस उपाय सोचना पड़ेगा ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और ये जड़ से ख़त्म हो जाये....तो चलिए मिलजुल कर कुछ सोचे...

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

अदिति जी में इस सब से बहुत ही दुखी हु..और हर तरह से आप के साथ हु .. में भी उस जगह का outrageous नाम का मेम्बर हु...लेकिन में वह पर सिर्फ हिंदी में टाइप करने और उस को पेस्ट करके यहाँ पर पोस्ट के लिए ही इस्तेमाल करता हु ...मेरा यह मानना है की उसको बहुत कम लोग पड़ते hai....और टिपण्णी तो शायद ही कोई करता हो ....बहुत ही परायेपन वाला माहौल है... वोह कोई नया ब्लोग्गर नहीं है...उसने सिर्फ आपकी पोस्ट के नीचे ही आपका आभार जाता कर पता दिया है... अगर वोह असल में इमानदार होता तो चोरी की दूसरी पोस्ट्स पर भी ऐसा ही करता... आपकी मदद करना एक तरह से खुद अपनी मदद करने के सामान होगा... में आपकी मन की हालत समझ सकता हु..मुझे खुद नहीं समझ आ रहा था की आपसे काया कहू.. दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था... अजय जी ने बहुत ही अच्छी जानकारी बताई है... और एक सुझाव जो की mouse का right click deactivate करने के बारे में है . इस बारे में हम सभी को मिल कर कोशिश करनी होगी ...

के द्वारा: rajkamal rajkamal

अदिति जी , लगता है आप लोगों को ऐसा होने की जानकारी पहली बार ही मिली है । प्रतिक्रियाओं को देख कर भी यही लगा । जबकि ब्लोग्गिंग में ये बहुत बार सुना गया है । आईये आपको कुछ उपाय बताता हूं , सबसे सटीक उपाय कि सभी ब्लोग्गर उन महाशय की पोस्ट पर जाकर जम कर लताड लगाएं , उनको मेल में भी आशीर्वाद दे सकते हैं । एक और काम हो सकता है वो है ब्लोग्गर को शिकायत यानि गूगल को , पता नहीं कितनों को वो आता है करना । अब एक और दिलचस्प काम की जानकारी www.copyscape.com , इस साईट पर आप अपने ब्लोग का पता भरके जान सकते हैं कि आपकी पोस्ट को , या उसमें लिखी किसी भी लाईन तक को किसने कहां से उडाया /लगाया है । यदि कुछ और जानना चाहें तो मेरा मेल पता तो है ही ।

के द्वारा: ajaykumarjha1973 ajaykumarjha1973

अदिति जी, यहाँ पर जज टीम ने पहले ही लिख रखा है .."Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers." अब आप बताइए जागरण moderator भी क्या करेगा.. वैसे में आपको एक राज की बात बताऊँ की जे.जे. टीम खुद ही एक नंबर की चोर है .. अब वो कैसे... आपको यकीन नही हो रहा होगा.. inki takniki टीम हम उपभोक्ताओं का इ-मेल एड्रेस हमारी बिनa आज्ञा के इस्तेमाल करती है और साथ ही साथ उस पर अपना नाम भी थोक देते हैं.. की ये इ-मेल जागरण की टीम की taraf से आया है.. और इसको तकनीकी भाषा में हम कहते है "ईमेल spoofing " अब इस विषय पर भी पूरा पूरा एक लेख लिखा जा सकता है और जागरण जंक्शन टीम को कटघरे में खींचा जा सकता है... khair यहाँ पर और भी तकनीकी khamiyan हैं jo की लिखने का मतलब है "आ बैल मुझे मार " वाली कहावत को चरितार्थ करना.. :) priti उत्तर के लिए dhanywaad.

के द्वारा:

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

अदिती जी मुझे लगा तो यही था नाम देखकर की किसी ने आपकी पोस्ट ज्यों की त्यों चाप दी है , इसीलिए आपसे भी और उन महाशय से भी हमने पूछा था की क्या यह पोस्ट आपकी है ? मुझे लगता है आप उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करके या फिर उसे ई-मेल के माध्यम से पहले सूचित करें | शायद वो ब्लॉग की दुनिया में नए है और मुझे लगता है उनको इसकी ज्यादा समझ नहीं होगी | आप उसे लिखेंगी तो निश्चय ही वो अपनी गलती स्वीकार करेंगे और बाकी भी जो उनकी दो पोस्ट है , चोरी की ही है | उनको भी वहां जाकर उसे आगे से ऐसा न करने से रोकना चाहिए | आप फ़िक्र मत कीजिए यह पोस्ट आपकी है और बहुत पहले से पब्लिश है | बस उसे आपको सम्मान देते हुए आपका लेख पोस्ट करना चाहिए था | वैसे आप बधाई की पात्र है | वो लेखक ही क्या जिसकी पोस्ट चोरी न हो , तो यह है आपकी सफलता | हमारी बधाई स्वीकारें :)

के द्वारा: seema seema

अदिती जी मुझे लगा तो यही था नाम देखकर की किसी ने आपकी पोस्ट ज्यों की त्यों चाप दी है , इसीलिए आपसे भी और उन महाशय से भी हमने पूछा था की क्या यह पोस्ट आपकी है ? मुझे लगता है आप उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करके या फिर उसे ई-मेल के माध्यम से पहले सूचित करें | शायद वो ब्लॉग की दुनिया में नए है और मुझे लगता है उनको इसकी ज्यादा समझ नहीं होगी | आप उसे लिखेंगी तो निश्चय ही वो अपनी गलती स्वीकार करेंगे और बाकी भी जो उनकी दो पोस्ट है , चोरी की ही है | उनको भी वहां जाकर उसे आगे से ऐसा न करने से रोकना चाहिए | आप फ़िक्र मत कीजिए यह पोस्ट आपकी है और बहुत पहले से पब्लिश है | बस उसे आपको सम्मान देते हुए आपका लेख पोस्ट करना चाहिए था | वैसे आप बधाई की पात्र है | वो लेखक ही क्या जिसकी पोस्ट चोरी न हो , तो यह है आपकी पहली सफलता | हमारी बधाई स्वीकारें :)

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: kaushalvijai kaushalvijai

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के द्वारा: yogendrayadav yogendrayadav

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

कविता पर इतनी सारी प्रतिक्रियाँ पढ़ने के बाद मजबूर होकर फिर लिखना पड़ा- 'इतनी अच्छी कविता जिसमें एक शब्द भी गलत नहीं लिखा है, उस पर तर्क वितर्क क्यों हों रहे हैं? अगर राह चलती कोई गलत महिला भी हो तो किसी दरिंदे या शरीफ को क्या हक है उसे ऊँगली करने का | बलात्कार अगर किसी वेश्या का हो तो भी दरिंदगी ही है| किसी ने कविता की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया, बहस शुरू कर दी | हाथ काट दो उसका जो किसी स्त्री की ओर गलत इरादों से उठे ! अब वह स्त्री किसी खानदानी परिवार से हो या भिखारिन, कोई स्कूल जाती बच्ची हो या धंधा करने वाली कोई वेश्या | लचर क़ानून वाले इस छद्म लोकतंत्र ने मानो हिन्दुस्तानी खून को पानी कर दिया, स्त्री को देखने के बाद काम इतना हावी हो जाता है तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में | स्त्री के चरित्र पर आक्षेप करने का अधिकार उसे कहाँ जिस पुरुष का अपनी वासना पर नियंत्रण ना हो? स्त्री हमारे आपके बीच रहती है उसे भरोसा दो कि हमारे रहते तुम्हे डरने कि जरूरत नहीं| अगर कोई स्त्री के साथ बदतमीजी करता है तो क्यों ना उसका फैसला वहीँ कर दिया जाय, सोच तो अपनी गन्दी है और मढ दिया स्त्री के सर! कोई स्त्री दिखे उलूल-जुलूल हरकत करते तो दो तमाचे खींच के और भगा दो गालियाँ दे कर लेकिन ये नहीं होगा क्योंकि कर तो रही है तुम्हारे मन वाला काम ही, कोई स्त्री किसी स्त्री को रिझाने के लिए भी कम कपडे पहनती है? दो जवाब, फिर भी चरित्र स्त्री का ही कमजोर है, वाह !

के द्वारा: chaatak chaatak

निखिल जी, सबसे पहले तो आप अपनी आँखों का चश्मा उतार लें और ये समझ ले की ये रचना पुरुषों के खिलाफ कतई नहीं है, ये उन दरिंदों के खिलाफ है जो नारी को भोग-विलास की वस्तु समझते हैं... अब मैं पहले अपनी बात करती हूँ....मेरे साथ भी एक बार ट्रेन में चढ़ते समय ऐसे ही एक दरिन्दे ने बदतमीजी करने की कोशिश की थी.....हमने भी उसे ऐसा जोर का झापड़ लगाया था कि जिंदगी में अब किसी लड़की को छेड़ने से पहले हजार बार सोचेगा....पर सभी हमारे जैसे नहीं होते हैं.....और सभी इतनी हिम्मत नहीं कर पाते हैं.....हमारे आगे-पीछे के लोग देख रहे थे पर किसी में इतनी ताकत नहीं थी उसका विरोध कर सके.... आप पूछ रहे थे ना कि क्या कोई इन्सान ४-५ साल की बच्ची का बलात्कार करेगा, क्या कोई इंसान ६५ साल की प्रौढ़ा का दामन तार तार करेगा; तो जरा इस डाटा पर गौर फरमाइए....भारत में १९७१ से लेकर २००६ के बीच बलात्कार कि संख्या में 678 % कि बढोत्तरी हुई है….ये तो हैं सरकारी रिकार्ड, हजारों केस तो ऐसे है जिनकी कुछ सामाजिक कारणों से पुलिस में शिकायत ही दर्ज नहीं कराई जाती है....इनमें से बलात्कार के ७५% केस ऐसे हैं जिसमे अपराधी पीड़ित का जान-पहचान वाला होता है......और १०% तो रिश्तेदार ही होते हैं.......और लगभग २५% पीड़ित नाबालिक होते हैं..... भगवान ने नारी को इस तरह बनाया कि उसमें शायद कुछ ज्यादा ही सहन शक्ति दे दी है.....तब तक सहती है जब तक सह सकती है.....पर जब अति हो जाती है तो काली बनने से भी नहीं घबराती है......सही कहा आपने हमारे देश में झाँसी की रानी और किरण बेदी जैसी बहादुर नारियां पैदा हुई है....सही है, पर सभी तो नहीं बन सकती ना...और हमारे सामाजिक बंधन उन्हें बनने नहीं देता....और जो बनती है पहले उनके ऊपर भी उंगलियाँ ही उठाई जाती है..... इस रचना का उद्देश्य आँसूं बहाना या नारी को अबला साबित करना नहीं है, बस नारी कि व्यथा बताने कि कोशिश है.....

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

भाई राजकमल, मुझे आपकी बात बिलकुल समझ मैं नहीं आई आप किस सन्दर्भ मैं ये बात कह रहे हैं ! सर्वप्रथम तो ये कि यदि आपको मुझ तक कोई सन्देश पहुँचाना है तो मेरे किसी लेख पर प्रतिक्रिया देकर पहुंचाएं ताकि मैं समझ सकूं कि आप किस ओर इशारा कर रहे हैं ! आप दूसरे कि पोस्ट पर मुझे कमेन्ट मार रहे हैं वो तो इत्तेफाक से मेरी नज़र इस पर पड़ गई, और मैं इसका जबाव दे रहा हूँ ! भाई तुमने मेरे टलेंट को सराहा धन्यबाद ! मैं अपने बारे मैं थोडा बताना चाहता हूँ भाई मैं कोई बहुत बड़ा लेखक या समाज सुधारक नहीं हूँ ! हाँ मैं एक fun loving व्यक्ति हूँ ! और अपने मित्रों के साथ मौज मस्ती करना मेरा स्वभाव है ! और यहाँ मैं सबको अपना मित्र मानता हूँ ! मैं बस उसी नाते एक दूसरे से जुड़ना चाहता था ! और शायद मैं अपनी कोशिश मैं कामयाब भी रहा ! आपने कुछ शब्द लिखे हैं बेहूदा...... फूहड़ कृपया ये किस सन्दर्भ मैं कहे ये समझाने कि जेहमत करें जिससे मैं अपना उत्तर दे सकूं !

के द्वारा: allrounder allrounder

के द्वारा: ilovepoetry ilovepoetry

अदिति जी, आपकी इस कविता पर मैं क्या विचार दूं मैं कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ, क्योंकि आपकी ये कविता मैं उस दिन पढ़ रहा हूँ जिस दिन भारत की नारी शक्ति झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस है ! आपकी कविता पढने के बाद मुझे ऐसा लगता है छेड़छाड़ तक तो आपकी बात समझ मैं आ रही है, मगर अभी भारत मैं बलात्कार जैसे जघन्य अपराध ने बिकृत रूप नहीं लिया है, इसका इलज़ाम पूरी की पूरी पुरुष जाति पर लगाना गलत होगा ! ये सब तो चंद मानसिक रूप से विकृत रुपी लोगों ने समाज को दूषित कर दिया है ! मगर मैं आपसे कहना चाहूँगा की अगर नारी इस छेडछाड का विरोध कर अपने छेडछाड करने वाले को पहला एक थप्पड़ लगाये तो बाकी उसमें १०० लात जूते अपने आप ही लग जायेंगे और उसे मारने वाला कोई पुरुष ही होगा !

के द्वारा: allrounder allrounder

माफ़ कीजियेगा, अदितिजी लेकिन चश्मा पहन कर लोगों की हाँ में हाँ मिलाने की आदत नहीं है मुझे. आपकी कविता अछि है और सच भी. लेकिन ज़रूरत इस बात की नहीं है की क्या हुआ और क्या हो रहा है. झाँसी की रानी, किरण बेदी, सुब्द्र कुमारी चौहान और मेरी कथा की नायिका सुहासिनी के इस देश में अगर औरत ये कहेगी की उसे उसका सम्मान नहीं मिलता तो में इससे असहमति रखता हूँ. ऐसे विषयों पर लेखों को सहानुभूति मिलती है. आपका प्रयास जायज़ है. लेकिन में पूछता हूँ, की क्या कोई इन्सान ४-५ साल की बच्ची का बलात्कार करेगा, क्या कोई इंसान ६५ साल की प्रौढ़ा का दामन तर-tar करेगा; उत्तर है नहीं. कुछ विकृत मानसिकता और दिमागी रूप से बीमार लोगों का उदहारण लेकर आप पुरे समाज पर कीचड नहीं उछाल सकतीं. आप में इतनी ताकत क्यूँ नहीं की बस में किसी के छेड़-छड करने पर उसका विरोध करें. आप में इतनी ताकत क्यूँ नहीं की हर उस दमन का जो आपके साथ होता है उसे रोकें. जब आपकी कविता पर आपके साथ आवाजा मिलाने वाले इतने लोग हैं तो आपको क्या लगता है हम आपके विरोध में आपका साथ नहीं देंगे. जहाँ तक रही मेरे बहिन की बात तो वो मेरी बहिन है, उस परिवार में पली बढ़ी है जहाँ उसे उसकी शक्ति का एहसास कराया गया. मैं पूछता हूँ, भारतवर्ष मैं जहाँ नारी, पत्नी नहीं माँ है; इसके उलट विचारों का पर्दापण किसने करवाया? अपनी जिम्मेदारी से भागने से काम नहीं चलेगा. ताली एक हाथ से नहीं बजती. आगे आइये और अपनी बेबसी पर आंसू बहाने के बजाय ये साबित कीजिये की आप कलिंगा की स्त्रियों की उस फ़ौज की तरह हैं जिन्होंने कंधे से कन्धा मिला कर अत्याचार के खिलाफ बगावत की थी. आप भारतवर्ष की नारी हैं, साबित कीजिये इसे; दिखा दीजिये की आपको हम भारतवाशी शक्ति और उर्जा का पर्याय क्यूँ मानते हैं. सिर्फ आंसू बहाने से कुछ न होगा.

के द्वारा: Nikhil Nikhil